Essay On Guitar In Hindi Language

बेस गिटार[1] (इलेक्ट्रिक बेस[2][3][4] या सिर्फ बेस भी कहा जाता है; उच्चारण सहायता/ˈbeɪs/, जैसा कि "बेस (base)" में) एक तंत्रवाद्य है जिसे मुख्यतः उंगली या अंगूठे से (प्लकिंग, स्लैपिंग, पॉपिंग, टैपिंग या थम्पिंग के द्वारा), या जव्वा का उपयोग करके बजाया जाता है।

बेस गिटार दिखने में और संरचना में इलेक्ट्रिक गिटार के समान है, लेकिन इसकी गरदन और स्केल लंबे और चार, पांच, या छः तंत्री होती हैं। चार तारों वाला बेस -अब तक का सर्वाधिक आम- बेस, है जिसे आमतौर पर एक गिटार के निचले चार तारों (ई, ए, डी और जी) से एक सप्तक नीची तारता के अनुरूप, डबल बेस की भांति समस्वरित किया जाता है।[5][6] बेस गिटार एक स्वर स्थानांतरण यंत्र है क्योंकि इसमें अत्यधिक लेजर रेखाओं से बचने के लिए इसकी ध्वनि से एक सप्तक ऊपर बेस पराससूचक में स्वरांकित किया जाता है (जैसा कि डबल बेस में है). इलेक्ट्रिक गिटार की तरह, इलेक्ट्रिक बेस गिटार को जीवंत प्रदर्शन के लिए एक प्रवर्धक और स्पीकर से जोड़ा जाता है।

1950 के दशक के बाद से, इलेक्ट्रिक बेस गिटार ने लोकप्रिय संगीत के लय अनुभाग में बेस यंत्र के रूप में डबल बेस को काफी हद तक प्रतिस्थापित कर दिया है। जबकि बेस गिटारवादक द्वारा बजाए जाने वाली बेसलाइन के प्रकार संगीत की एक शैली से दूसरी में बदलते रहते हैं, एक बेस गिटारवादक समस्वरित संरचना को स्थिर करके तथा ताल निर्धारित करके, इसी प्रकार की भूमिका अधिकांश प्रकार के संगीत में पूर्ण करता है। बेस गिटार रॉक, मेटल, पॉप, एसकेए, रेगे, डब, पंक रॉक, कंट्री, ब्लूज़ और जैज सहित संगीत की अनेक शैलियों में प्रयुक्त होता है। जैज, फ्यूजन, लैटिन, फंक और कुछ रॉक तथा भारी मेटल शैलियों में इसका एकल उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

इतिहास[संपादित करें]

1930-1940 के दशक[संपादित करें]

1930 के दशक में सिएटल, वाशिंगटन के संगीतकार और आविष्कारक पॉल टटमार्क ने क्षैतिज पकड़ कर बजाने के लिए डिजाइन किए गए आधुनिक रूप के पहले पर्दे युक्त इलेक्ट्रिक बेस का विकास किया। टटमार्क की इलेक्ट्रोनिक संगीत वाद्ययंत्र कंपनी ऑडियोवॉक्स के 1935 के बिक्री सूचीपत्र में उनका एक चार तारों वाला, ठोस-बॉडी, 30½-इंच स्केल लंबाई के साथ पर्दे युक्त इलेक्ट्रिक बेस वाद्ययंत्र “मॉडल 736 बेस फिडल” शामिल था।[7] एक "गिटार" के रूप में परिवर्तन से इस वाद्ययंत्र को पकड़ना और उसका परिवहन आसान हो गया तथा पर्दों के जोड़ने से बेसवादक के लिए सुर में बजाना और आसान हो गया। इस अवधि के दौरान 100 के आसपास ये उपकरण बनाए गए थे।

1947 के आसपास, टटमार्क के पुत्र, बड ने सेरिनेडर ब्रांड नाम के अंतर्गत इसी के समान बेस का विपणन शुरू किया, जिसको राष्ट्रीय स्तर पर वितरित '48 की एलडी हीटर कं. की थोक विक्रेता सूची में प्रमुखता से विज्ञापित किया गया था। हालांकि, टटमार्क परिवार के आविष्कारों को बाजार में सफलता हासिल नहीं हुई.

1950 का दशक[संपादित करें]

1950 के दशक में, लियो फेंडर ने अपने कर्मचारी जॉर्ज फुलर्टन की सहायता से पहले बड़े पैमाने पर उत्पादित इलेक्ट्रिक बेस का विकास किया।[8] उनके द्वारा 1951 में शुरू किया गया फेंडर प्रिसिजन बेस, व्यापक रूप से नकल किया जाने वाला उद्योग का मानक बन गया। आराम तथा एक एकल चार-पोल "एकल कुंडली पिकअप" के लिए, एक एकल कुंडली पिकअपके साथ एक टेलीकास्टर के समान डिजाइन वाले, एक सरल, बिना रूपरेखा वाली "पट्टी" बॉडी से ढलवां किनारों वाले एक निर्धारित बॉडी डिजाइनयुक्त प्रिसिजन बेस (या “पी-बेस”) का विकास हुआ। 1957 में शुरू किए गए "स्प्लिट पिकअप" में लगता है दो मैंडोलिन रहे थे (फेंडर उस समय एक चार तंत्रियों के ठोस बॉडी वाले इलेक्ट्रिक मैंडोलिन का विपणन कर रहा था). श्रेणी क्रम में जुड़ी हुई दो कुंडलियां एक हमबकिंग प्रभाव उत्पन्न करती थीं क्योंकि कुंडलियों के ध्रुव खंडों को एक दूसरे से उलट दिया गया था और तारों को भी एक दूसरे के प्रति उलट दिया गया था। (ठीक यही प्रभाव दोनों कुंडलियों को समानांतर क्रम में जोड़ने से भी उत्पन्न होता है).

"फेंडर बेस एक नया क्रांतिकारी वाद्ययंत्र था, जो एक इलेक्ट्रिक गिटारवादक द्वारा आसानी से बजाया जा सकता था, जिसे आसानी से एक घोड़ागाड़ी तक ले जाया जा सकता था, जिसको प्रतिपुष्टि किए बिना किसी भी तीव्रता तक प्रवर्धित किया जा सकता था”.[9] मोंक मोंगोमेरी विश्वयुद्ध के बाद लियोनेल हैम्प्टन के बिग बैंड के साथ फेंडर बेस गिटार सहित दौरा करने वाला प्रथम बेस वादक था।[10] हैम्पटन के बैंड में मोंगोमेरी की जगह लेने वाले रॉय जॉनसन तथा लुई जॉर्डन और उसके टिंपनी फाइव के साथ शिफ्टी हेनरी अन्य अग्रणी प्रारंभिक फेंडर बेस वादक थे।[8] बिल ब्लैक ने एल्विस प्रेस्ली के साथ वादन करते हुए 1957 के आसपास फेंडर प्रिसिजन बेस को अपनाया था।[11]

फेंडर का अनुकरण करते हुए गिब्सन ने 1953 में, बढ़ाई जा सकने वाली एंड पिन के साथ वायलिन के आकार का इलेक्ट्रिक बेस जारी किया जिसे क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर पकड़ कर बजाया जा सकता था। गिब्सन ने 1958 में अपने इलेक्ट्रिक बेस का फिर से नाम रखा ईबी-1 (EB-1)[12] (ईबी-1 को 1970 के आसपास फिर से जारी किया गया था, लेकिन इस बार बिना पिन के.) 1958 में भी गिब्सन ने मेपल के धनुषाकार शीर्ष वाला ईबी-2 (EB-2) जारी किया जिसको गिब्सन की सूची में एक दो भिन्न लययुक्त विशेषताओं के लिए एक बेस/बैरीटोन पुशबटन की सुविधायुक्त एक खोखली बॉडी वाले बेस के रूप में वर्णित किया गया था।[13] इनके बाद 1959 और अधिक परंपरागत दिखने वाला ईबी-0 बेस आया। ईबी-0 दिखने में बहुत कुछ गिब्लन एसजी के समान था (यद्यपि प्रारंभिक उदाहरणों में इसका आकार डबल-कटअवे लेस पॉल स्पेशल के आकार से मिलता जुलता पट्टी-पार्श्व वाला था).

जबकि फेंडर बेसों में गरदन के आधार और ब्रिज के शीर्ष के बीच में आरोहित पिकअप थे, गिब्सन के कई प्रारंभिक बेसों में सीधे गरदन की पॉकेट पर ही आरोहित एक हमबकिंग पिकअप था। 1961 में आए ईबी-3 (EB-3) में भी ब्रिज के स्थान पर एक “मिनी-हमबकर” था। गिब्सन बेस और अधिक छोटे और आकर्षक वाद्ययंत्र होते गए थे; गिब्सन ने 1963 तक 34” स्केल बेस उत्पादित नहीं किया था, जब गिब्सन का पहला गरदन और ब्रिज के लगभग बीचों बीच अधिक पारंपरिक स्थान पर दोहरे-हमबकिंग पिकअप का उपयोग करने वाला, बेस थंडरबर्ड जारी हुआ था। एक छोटी संख्या में अन्य कंपनियों ने भी 1950 के दशक में बेस गिटार का निर्माण शुरू किया थाः के (Kay) 1952 में, डैनिलेक्ट्रो (Danelectro) 1956 में;[11]

1956 में जर्मन व्यापार मेले "म्यूजिकमेसे फ्रैंकफर्त" में दूसरी पीढ़ी के वॉयलिन शिल्पी वॉल्टर हॉफनर की वॉयलिन निर्माण तकनीकों का उपयोग करके बनाया गया विशिष्ट वॉयलिन बेस हॉफनर 500/1 सामने आया।[14] पॉल मकार्टनी द्वारा अनुमोदन की वजह से इस वाद्ययंत्र को अक्सर बीटल बेस के नाम से जाना जाता है।

1957 में रिकनबैकर ने बॉडी-में से-गरदन डिजाइन की सुविधा वाला पहला बेस मॉडल 4000 बेस प्रस्तुत किया; फेंडर और गिब्सन संस्करणों में गरदनों को बोल्ट से या सरेस से जोड़ा जाता था।[15]

1960 का दशक[संपादित करें]

1960 के दशक में रॉक संगीत की लोकप्रियता के विस्फोट के साथ अनेक और निर्माताओं ने इलेक्ट्रिक बेसों का निर्माण शुरू किया।

पहली बार 1960 में पेश किया गया फेंडर जैज बेस डीलक्स बेस के नाम से जाना गया और जैजमास्टर गिटार की संगत करने के लिए बनाया गया था। जैज बेस (अक्सर "जे-बेस" कहा जाता है) में दो एकल-कुंडली पिकअप थे, एक ब्रिज के नजदीक और एक प्रिसिजन बेस के विभाजित-कुंडली पिकअप स्थान में. बेसों के सबसे पुराने निर्माण में प्रत्येक पिकअप के लिए क्रमबद्ध तीव्रता तथा स्वर नियंत्रण था इसे जल्दी ही प्रत्येक पिकअप के लिए एक तीव्रता नियंत्रण तथा एकल निष्क्रिय स्वर नियंत्रण के परिचित विन्यास में बदल दिया गया। जैज बेस की गरदन नट पर प्रिसिजन बेस से अधिक संकरी थी (1½" बनाम 1¾")

जैज बेस को प्रिसिजन से अलग करने वाला एक दृश्य अंतर इसकी "ऑफसेट-वेस्ट" बॉडी है। प्रिसिजन बेस और जैज बेस पिकअपों में दृश्य एवं विद्युतीय अंतरों के संदर्भ में इलेक्ट्रिक बेसों के पिकअप आकारों को प्रायः “पी” ("P") या “जे” ("J") कहा जाता है। गौरतलब है कि फेंडर ने इस मॉडल के हैडस्टॉक के लिए एक डीकल नोट जैजबेस इलेक्ट्रिक बेस [3] के साथ लेबल चुना.

फेंडर ने टॉकिंग हैड्स की टीना वेमाउथ और द रोलिंग स्टोन्स के बिल वायमैन जैसे बेस वादकों द्वारा प्रयुक्त 30" स्केल लंबाई वाले वाद्ययंत्र मुस्तांग बेस का निर्माण भी शुरू किया (सभी प्रकार के वर्तमान में निर्मित अधिकांश इलेक्ट्रिक बेसोंमें में प्रतिध्वनित होते डिजाइन के "पी" और "जे" बेसों में स्केल लंबाई 34" होती है).

1950 और 1960 के दशकों में, फेंडर के प्रारंभिक प्रभुत्व के कारण इस वाद्ययंत्र को अक्सर “फेंडर बेस” कहा जाता था।

1970 का दशक[संपादित करें]

1970 के दशक ने टॉम वॉकर, फॉरेस्ट व्हाइट और लियो फेंडर द्वारा म्यूजिक मैन इंस्ट्रूमेंट्स की स्थापना होते देखी, जिसने पहले सक्रिय (यंत्रचालित) इलेक्ट्रोनिक्स के साथ व्यापक पैमाने पर उत्पादित, स्टिंगरे (StingRay) का उत्पादन किया। इसके कारण न्यून-अंत निर्गम और समग्र आवृत्ति अनुक्रिया (अधिक न्यून और उच्च) में वृद्धि तथा बेस के पिकअप की निर्गम प्रतिबाधा को कम करते हुए वाद्ययंत्र पर पूर्व प्रवर्धक प्रतिबाधा उत्पन्न होता है। विशिष्ट मॉडल संगीत की अलग-अलग शैलियों की पहचान बन गए, जैसे रिकनबैकर 4001 श्रृंखला, प्रगतिशील रॉक बेसवादक येस के क्रिस स्क्वायर की पहचान बन गई, जबकि फंक बैंड द ब्रदर्स जॉनसन के लुइस जॉनसन स्टिंगरे का इस्तेमाल करते थे।

1971 में, अलेम्बिक ने आदर्श स्थापित किए जो "बुटीक" या “उच्च अंत” इलेक्ट्रिक बेस गिटार के नाम से जाने गए। स्टेनली क्लार्क द्वारा प्रयुक्त इन महंगे, व्यवहार अनुरूपित उपकरणों की विशेषताओं में अद्वितीय डिजाइन, प्रीमियम हस्त-निर्मित लकड़ी की बॉडी, पूर्व प्रवर्धन तथा समकरण के लिए आरोहित इलेक्ट्रोनिक्स, बहु-आपट्टन बॉडी-में से-गरदन निर्माण और ग्रेफाइट गरदन जैसा नवोन्मेषी निर्माण तकनीकें शामिल हैं। 1970 के दशक के मध्य में, अलेम्बिक तथा अन्य बुटीक बेस निर्माताओं जैसे टोबायस ने नीचे "बी" तार सहित चार-तंत्री और पंच-तंत्री बेसों का उत्पादन किया। 1975 में, बेसवादक एंथोनी जैक्सन ने तंत्रवाद्य शिल्पी कार्ल थॉम्पसन को एक बी0, ई1, ए1, डी2, जी2, सी3 समस्वरित छः तंत्री बेस के निर्माण के लिए अधिकृत किया था।

1980 के दशक से 2000 का दशक[संपादित करें]

1980 के दशक में, बेस डिजाइनरों ने लिए नए तरीकों का पता लगाना जारी रखा. नेड स्टीनबर्गर ने 1979 में सिर-विहीन बेस पेश किया और ग्रेफाइट तथा अन्य सामग्रियों का उपयोग करते हुए 1980 के दशक में अपने नवाचारों को जारी रखा और (1984 में) अतिद्रुत चालन लयखंड ट्रांस-टर्म पेश किया। 1987 में, गिल्ड गिटार निगम ने पर्दाहीन एशबोरी बेस शुरू किया जिसमें सिलिकॉन रबर तार और एक छोटी 18" स्केल लंबाई के साथ एक डबल बेस ध्वनि प्राप्त करने के लिए एक पीजोइलेक्ट्रिक पिकअप का उपयोग होता था। 1980 के दशक के अंत में, एमटीवी (MTV) के शो “अनप्लग्ड”, जिसमें बैंड्स ने ध्वनिक वाद्ययंत्रों साथ प्रदर्शन किए, ने पिकअप के साथ प्रवर्धित खोखली बॉडी वाले ध्वनिक बेस गिटार को लोकप्रिय बनाने में सहायता की.

1990 के दशक के दौरान, चूंकि पंच तंत्री बेस अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध हो गए तथा अधिक किफायती हो गए, बढ़ती हुई संख्या में बेसवादकों ने मेटल से लेकर गोस्पेल तक, मानक "ई" तार के नीचे एक कम रेंज का- एक नीचा "बी" तार जोड़कर पंच-तंत्री वाद्ययंत्र का उपयोग करना शुरू कर दिया. एकल सेटिंग में काफी प्रदर्शन करने वाले कुछ बेसवादकों ने ऊंची रेंज प्राप्त करने के लिए पांचवें तार के रूप में एक ऊंचा "सी" तकर जोड़ कर पंचतंत्री बेसों का उपयोग किया। साथ ही, पटल पर आरोहित बैट्री-चालित इलोक्ट्रोनिक्स, जैसे पूर्व प्रवर्धक और समकारक परिपथ, जो पूर्व में सिर्फ महंगे "बुटीक" वाद्ययंत्रों में ही उपलब्ध थे, तेजी से साधारण मूल्य के बेसों पर उपलब्ध होने लगे.

21वीं सदी के पहले दशक में, कुछ बेस निर्माताओं ने बेसों के कई मॉडलों के स्वरों और ध्वनियों को पुनः उत्पन्न करने के लिए वाद्ययंत्रों के अंदर डिजिटल मॉडलिंग परिपथ शामिल किए (जैसे, लाईन 6 का वेरिएक्स बेस). फेंडर प्रेसिजन बेस तथा फेंडर जैज बेस जैसे पारंपरिक बेस डिजाइन 21वीं सदी के पहले दशक में लोकप्रिय बने रहे; 2006 में फेंडर द्वारा फेंडर जेगुआर बेस को पेश करने के साथ-साथ एक 60वीं एनिवर्सरी पी-बेस पेश किया गया।

डिजाइन विवेचना[संपादित करें]

बेस बॉडी आमतौर पर लकड़ी से बनी होती हैं, हालांकि अन्य सामग्री जैसे ग्रेफाइट (उदाहरण के लिए, स्टीनबर्गर के कुछ डिजाइन) का भी उपयोग किया गया है। जबकि बेस गिटार की बॉडी, गरदन और पर्दापटल के लिए विभिन्न प्रकार की लकड़ियां काम में लेने के लिए उपयुक्त हैं, बॉडी के लिए एल्डर, गरदन के लिए मैपल और पर्दापटल के लिए रोजवुड सर्वाधिक प्रचलित हैं। सामान्यतः प्रयोग की जाने वाली अन्य लकड़ियों में महोगनी, मेपल, एश और चिनार बॉडी के लिए, महोगनी गर्दन के लिए और मेपल तथा आबनूस पर्दापटल के लिए, शामिल हैं।

अन्य डिजाइन विकल्पों में परिसज्जा, जैसै चपड़ी की वार्निश, मोम और तेल, सपाट और नक्काशीदार डिजाइन, तंत्रवाद्य शिल्पी द्वारा निर्मित आवश्यकतानुसार डिजाइन किए हुए वाद्ययंत्र; वाद्ययंत्र के ब्रिज में समस्वरण यंत्र सहित सिरविहीन बेस, (जैसे, स्टीनबर्गर और हॉफनर डिजाइन) तथा अन्य कई कृत्रम सामग्रियां जैसे लुथाइट शामिल हैं। कृत्रिम सामग्री का उपयोग (जैसे, बेसलैब) ठप्पा ढलाई जैसी अद्वित्तीय उत्पादन तकनीकों तथा जटिल बॉडी आकारों के उत्पादन की सुविधा प्रदान करता है। जबकि अधिकतर बेसों की बॉडी ठोस होती हैं, अनुनाद बढ़ाने या वाद्ययंत्र का वजन कम करने के लिए वे खोखली भी हो सकती हैं। कुछ बेस पूरी तरह खोखली बॉडी के साथ बनाए जाते हैं, जिससे वाद्ययंत्र के स्वर और अनुनाद परिवर्तित हो जाते हैं। ध्वनिक बेस गिटार आमतौर पर पीजोइलेक्ट्रिक या चुंबकीय पिकअप से सुसज्जित होते हैं और प्रवर्धित होते हैं।

अत्यधिक कुशल तंत्रवाद्य शिल्पियों द्वारा हस्तनिर्मित उपकरण तेजी से उपलब्ध होते जा रहे हैं। विदेशी सामग्रियों में बुबिंगा, वेंगे, ओवंगकोल, आबनूस तथा गोनसालो आल्वेस शामिल हैं। हल्की गरदन बनाने के लिए मिश्रित ग्रेफाइट का उपयोग किया जाता है।[16][17] विदेशी लकड़ियों का उपयोग अधिक महंगे वाद्ययंत्र बनाने के लिए किया जाता हैः उदाहरण के लिए, अलेम्बिक में कोकोबोलो का उपयोग इसके आकर्षक कणों के कारण बॉडी या ऊपरी परत की सामग्री के रूप में किया जाता है, वार्विक बेस गिटार भी विदेशी हार्डवुड के लिए प्रसिद्ध हैः अधिकतर गरदनें ओवंगकोल से बनाई जाती हैं तथा अंगुलिपटल वेंगे या आबनूस से बनाए जाते हैं। स्वर तथा सौंदर्य की गुणवत्ता के लिए ठोस बुबिंगा का उपयोग किया जाता है।

34" की स्केल लंबाई (नट और ब्रिज के बीच की दूरी) देने वाले लियो फेंडर के बेसों में प्रयुक्त "लंबी गरदनें" इलेक्ट्रिक बेसों के लिए मानक बनी हुई हैं। हालांकि, 30" या “छोटे स्केल” वाले वाद्ययंत्र, जैसे पॉल मकार्टनी द्वारा बजाया जाने वाला हॉफनर 500/1 "वॉयलिन बेस" और फेंडर मुस्तांग बेस विशेष रूप से छोटे हाथ वाले वादकों में लोकप्रिय हैं। जबकि 35", 35.5" और 36" स्केल लंबाइयां सिर्फ एक बार ही 21 वीं सदी के पहले दशक में बुटीक वाद्ययंत्रों में उपलब्ध हुई थी, कई निर्माताओं नें इन लंबाइयों को पेश करना शुरू कर दिया है, जिन्हें "अतिरिक्त लंबे स्केल" कहा जाता है। इस अतिरिक्त लंबे स्केल से एक उच्च स्ट्रिंग तनाव मिलता है, जो पांच और छह तारोंवाले वाद्ययंत्रों (या विषमस्वरित चार तारों वाले बेस) के 'बी' स्ट्रिंग पर एक अधिक परिभाषित स्वर पैदावार प्रदान करता है।

पर्देयुक्त और पर्दाहीन बेस[संपादित करें]

अंगुलिपटल पर पर्दे का उपयोग किया जाए या नहीं, यह एक अन्य डिजाइन पहलू है। एक पर्देयुक्त बेस पर पर्दा अंगुलिपटल को अर्द्धस्वरक भागों में विभाजित करता है (जैसा कि गिटार में होता है). मूल फेंडर बेसों में 20 पर्दे होते थे, लेकिन आधुनिक बेसों में 24 या अधिक पर्दे हो सकते हैं। पर्देरहित बेस की एक अलग ध्वनि होती है, क्योंकि पर्दे की अनुपस्थिति का मतलब है कि तार को सीधे ही अंगुलिपटल की लकड़ी पर नीचे दबाया जाना चाहिए जैसा कि डबल बेस में होता है। तार लकड़ी के खिलाफ भनभनाता है और शांत हो जाता है क्योंकि तार का बजने वाला भाग वादक की अंगुली के मांसल भाग के सीधे संपर्क में होता है। पर्दारहित बेस में वादक को मीड़, प्रकंपन तथा सूक्ष्म सुपीलेपन के व्यंजक उपकरणों का उपयोग करने के सुविधा मिलती है, जैसे चतुर्थांश सुर और सही सुरीलापन.

कुछ वादक प्रदर्शन में अपने प्रदर्शन की सामग्री के प्रकार के आधार पर पर्दायुक्त और पर्दारहित दोनों तरह के बेसों का उपयोग करते हैं, जैसे पिनो पलादिनो, जिनके 1980 के दशक के दौरान पर्दारहित बेस पर प्रदर्शन ने उन्हें एक ऊंची मांग वाला सत्र वादक बना दिया था, एरिक क्लैप्टन और डेविड गिलमोर जैसे ऊंचे प्रोफाइल वाले संगीतकारों ने उनका समर्थन किया। हालांकि, 1990 के दशक के अंत ने पर्दायुक्त बेसों की ओर भी रुझान दिखाया, जब उन्होंने व्यापक रूप से विविध शैलियों में बजाना शुरू किया। जबकि पर्दारहित बेसों को आम तौर पर जैज या जैज संलयन के साथ जोड़ा जाता है, अन्य शैलियों के वादक भी पर्दारहित बेसों का उपयोग करते हैं, जैसे आधुनिक/प्रगतिशील रॉक बैंड पोर्क्यूपाइन ट्री के मेटल बेस वादक स्टीव डिजॉर्जिओ तथा कोलिन एडविन.

पहला पर्दारहित बेस गिटार बिल वायमैन द्वारा 1961 में बनाया गया था जब उन्होंने एक सस्ते जापानी पर्दायुक्त बेस के पर्दे हटाकर उसे रूपांतरित किया था।[18][19] पर्दारहित बेस का पहला उत्पादन एएमपीईजी (Ampeg) एयूबी-1 था जिसे 1966 में पेश किया गया था और फेंडर ने 1970 में पर्दारहित प्रेसिजन बेस पेश किया। 1970 के दशक के शुरू में, संलयन-जैज बेसवादक जैको पास्टोरिअस ने एक फेंडर जैज बेस से पर्दे[20] हटाकर, छिद्रों को लकड़ी की पुट्टी से भरके और अंगुलिपटल पर इपोक्सी राल[21] की परत चढ़ा कर अपना स्वयं का पर्दारहित बेस बनाया था। कुछ पर्दारहित बेसों में अंगुलिपटल के अंदर मार्गदर्शक के रूप में “फ्रेटलाइन” चिह्नक जड़े होते हैं, जबकि अन्य सिर्फ गरदन के पार्श्व में मार्गदर्शक चिह्नकों का उपयोग करते हैं।

कभी कभी टेपवाउंड (डबल बेस प्रकार) और फ्लैटवाउंड तंत्रियों का पर्दारहित बेस में प्रयोग किया जाता है, जिससे धातु तंत्री च्क्रों से अंगुलिपटल की घिसावट नहीं होती. अंगुलिपटल का स्थायित्व बढ़ाने, सहनशीलता बढ़ाने तथा चमकदार रंगत देने के लिए कुछ पर्दारहित बेसों के अंगुलिपटलों पर इपोक्सी का लेपन किया जाता है। यद्यपि अधिकांश पर्दारहित बेस चारतंत्री होते हैं, पंचतंत्री और छह तंत्री पर्दारहित बेस भी उपलब्ध हैं। छः तार से अधिक वाले पर्दारहित बेस भी "बुटीक" या "विशेष रूप से निर्मित" वाद्ययंत्रों के रूप में उपलब्ध हैं।

तार और समस्वरण[संपादित करें]

मुख्य लेख : Bass guitar tuning

इलेक्ट्रिक बेस गिटार के मानक डिजाइन में चार तार समस्वरित ई, ए, डी और जी, चतुर्थांश में इस प्रकार होते हैं, कि उच्चतम तार जी, मध्य सी के नीचे ग्यारहवां (एक सप्तक और एक चतुर्थांश), सभी चार तारों का समस्वरण डबल बेस की भांति ही कर देते हैं। यह समस्वरण भी छः तंत्री गिटार के नीचे के चार तारों के मानक समस्वरण के समान ही है, सिर्फ एक सर्तक नीचे। तंत्रियों के प्रकारों में सभी धातु के तार शामिल हैं (राउंडवाउंड, फ्लैटवाउंड, हाफवाउंड, ग्राउंडवाउंड और प्रेशरवाउंड); इसी प्रकार धातु के तारों पर विभिन्न आवरण जैसे टेपवाउंड और प्लास्टिक-परत. तारों में सामग्री के विभिन्न प्रकारों के प्रयोग से बेस वादक को स्वरों के विकल्पों की एक श्रृंखला मिलती है। 1950 के दशक और 1960 के दशक के आरंभ में, ज्यादातर बेसवादक एक चिकनी सतह वाले फ्लैटवुड तंत्री का उपयोग करते थे, जिसकी सम, अवमंदित ध्वनि डबल बेस की ध्वनि याद दिलाती थी। 1960 के दशक के अंत में और 1970 के दशक में, राउंडवाउंड बेस तंत्रियां गिटार तंत्रियों के समान लोकप्रिय हुई हालांकि फ्लैटवाउंड भी लोकप्रिय हो रही हैं। राउंडवाउंड की अधिक स्पष्ट स्वर विशेषता के साथ फ्लैटवाउंड की तुलना में स्थायित्व भी अधिक है।

वाद्ययंत्र की सीमा का विस्तार करने के लिए समस्वरण के अनेक विकल्पों तथा बेस प्रकारों का उपयोग किया गया है। चार, पांच, या छः तंत्री सर्वाधिक आम हैं:

  • विस्तारित लघु सीमा प्राप्त करने के लिए वैकल्पिक समस्वरणों के साथ चार तंत्री .[22] पंचम में समस्वरण उदाहरण के लिए, सीजीडीए (CGDA) एक विस्तारित ऊपरी और निचली सीमा देता है।
    मानक ईएडीजी समस्वरण में एक दाहिने हाथ वाले चार-तंत्री बेस की स्थितियों पर ध्यान दें. वादक को विभिन्न स्थितियां खोजने में दृश्य सहायता के रूप में, बेस गरदन की लकड़ी में प्रायः पर्दों के नीचे डॉट्स लगे होते हैं।
  • पांच तंत्री को आमतौर पर बी0-ई1-ए1-डी2-जी2 (B0-E1-A1-D2-G2) समस्वरित किया जाता है, जो विस्तारित निचली सीमा प्रदान करता है। सप्त तंत्री गिटारों, बैरीटोन गिटारों और अन्यथा स्वर उतारे हुए वाद्ययंत्रों के साथ-साथ बी-ई-ए-डी-जी पर समस्वरित पांच तंत्री बेस (और कभी-कभी ए-डी-जी-एस-एफ) प्रायः समकालीन रॉक और मेटल में प्रयुक्त होते थे। प्रारंभिक पांच तंत्री बेसों में प्रयुक्त होने वाला अन्य आम समस्वरण ई-ए-डी-जी-सी था जिसे "टेनर ट्यूनिंग" के नाम से जाना चाहता था। यह अभी भी जैज और एकल बेस के लिए एक लोकप्रिय समस्वरण है। सी-ई-ए-डी-जी जैसे अन्य समस्वरण का यद्यपि इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन बहुत ही कम. पांचवीं तंत्री एक बड़ी नीची सीमा प्रदान करती है (अगर एक नीचे बी या ए का प्रयोग किया जाता है) या एक चार तंत्री बेस से बड़ी ऊपरी सीमा (अगर एक उच्च सी तंत्री जोड़ी गयी है) और हाथ की किसी भी स्थिति के लिए और अधिक नोट्स में पहुँच देती है। सबसे पहला पाँच तंत्री 1965 में फेंडर द्वारा बनाया गया था। फेंडर बेस वी में ई-ए-डी-जी-सी समस्वरण था, लेकिन अलोकप्रिय था। अलेम्बिक द्वारा सामान्य नीचे बी वाला पाँच तंत्री जिमी जॉनसन के लिए विशेष रूप से बनाया गया था और बाद में यामाहा द्वारा 1984 में पहला उत्पादन मॉडल बीबी5000 (BB5000) पेश किया।
  • छः तंत्री आमतौर पर बी0-ई1-ए1-डी2-जी2-सी3 समस्वरित होते हैं। छः-तंत्री बेस एक अतिरिक्त नीचे "बी" तंत्री और एक उच्च "सी" तंत्री के साथ एक चार-तंत्री बेस है। जबकि चार- या पांच-तंत्री बेसों से बहुत कम प्रचलित हैं, फिर भी वे लैटिन, जैज तथा कई अन्य शैलियों के साथ-साथ स्टूडियो कार्य में जहां एक ही उपकरण का बहुमुखी होना जरूरी होता है, प्रयुक्त होते हैं। छः-तंत्री बेस के लिए वैकल्पिक समस्वरीकरण में बी-ई-ए-डी-जी-बी शामिल है, एक ध्वनिक या इलेक्ट्रिक गिटार की पहली पांच तंत्रियों से मिलान तथा ईएडीजीबीई, पूरी तरह से एक छः-तंत्री गिटार के समस्वरीकरण से मिलान लेकिन गिटार तार अंगुलिचालन प्रदान करने के लिए एक सप्तक नीचे। ईएडीजीसीएफ और एफ#बीईएडीजी जैसे दुर्लभ समस्वरीकरण दी गई स्थिति में एक नीची या उच्च सीमा प्रदान करते हुए लगातार तंत्री अंतराल बनाए रखता है। मूल छः-स्ट्रिंग बेस डैनिलेक्ट्रो द्वारा 1958 में एक सप्तक नीचे (ईएडीजीबीई (EADGBE)) बनाया गया था। 1970 के दशक में, एंथोनी जैक्सन) ने कार्ल थॉम्पसन और (बाद में) फोडेरा के सहयोग से केन स्मिथ के साथ कोंट्राबेस गिटार बनाई जिससे आधुनिक छः-तंत्री बेस (बीईएडीजीसी) का विकास हुआ।
  • अधोस्वरक जैसे हिपशॉट पर्दा चालन हाथ के अंगूठे द्वारा संचालित यांत्रिक उपकरण हैं जिनसे एक या अधिक तंत्रियों को पूर्व निर्धारित कम तारता पर शीघ्रता से अधोस्वरित किया जा सकता है। हिपशॉट्स का उपयोग आम तौर पर एक चार तंत्री बेस में "ई" तंत्री को "डी" पर नीचा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।[23]

वैकल्पिक सीमा दृष्टिकोण[संपादित करें]

कुछ बेसवादकों ने एक विस्तृत रेंज या किसी भी स्थान पर स्वरों के कई सप्तक प्रदान करने के रूप में अन्य लाभ प्राप्त करने और साथ ही एक काफी बड़ी तानवाली रेंज प्राप्त करने के लिए समस्वरण के तरीकों के अन्य प्रकारों का इस्तेमाल किया है। इस उद्देश्य के लिए प्रयुक्त वाद्यों के प्रकार या समस्वरणों में शामिल हैं, चार से कम तंत्रियों वाले बेस (एक-तंत्री बेस गिटार,[24] दो-तंत्री बेस गिटार, तीन-तंत्री बेस गिटार (ई-ए-डी);)[25]वैकल्पिक समस्वरण (उदाहरण के लिए, उच्च स्वर बेस,[26] पिकोलो बेस[27] और गिटार-समस्वरित बेस)[28] तथा 8, 10, 12 और 15-तंत्री बेस जो 12-तंत्री गिटार के समान सिद्धांत पर बनाए गए हैं जहां तंत्रियों को “कोर्सेज” में समूहीकृत कर एकस्वरता या सप्तकों में समस्वरित किया जाता हैं।

विस्तारित रेंज बेस (ईआरबी (ERBs)) छः से बारह तंत्रियों वाले बेस हैं- जहां अतिरिक्त तंत्रियां एकस्वरता या सप्तक युग्मों की बजाय रेंज के लिए प्रयुक्त होती हैं। एक सात तंत्री बेस (बी0-ई1-ए1-डी2-जी2-सी3-एफ3) तंत्रवाद्य शिल्पी माइकल टोबायस द्वारा 1987 में बनाया गया था। बेसवादक गैरी गुडमैन द्वारा अधिकृत यह उपकरण, छः से अधिक एकल स्तर तंत्रियों वाले बेस का एक प्रारंभिक उदाहरण था। कोंकलिन आठ- और नौ- तंत्री बेस बनाता है।[29] गिटारबेस एक दस-तंत्री वाद्ययंत्र है जिसमें चार बेस तंत्री (ई-ए-डी-जी समस्वरित) तथा छः गिटार तंत्री (ई-ए-डी-जी-बी-ई समस्वरित) होतेी हैं।[30]

तंत्रवाद्य शिल्पी माइकल ने एडलर 2004 में पहली बार 11-तंत्री बेस बनाया और 2005 में पहला एकल स्तर 12-तंत्री बेस पूरा किया। एडलर के 11- और 12-तंत्री वाद्ययंत्रों की वैसी ही बड़ी रेंज है जैसी एक भव्य पियानो की.[31] विपरीत-उप बेस, जैसे सी#-एफ#-बी-ई ("सी#" 17.32 हर्ट्ज पर (सी♯0) है)[32] बनाए गए हैं। इबानेज ने 2009 में एसआर7VIIएससी (SR7VIISC) जारी किया था, जिसकी स्केल लंबाई 30” तथा चौड़ाई कम, बी-ई-ए-डी-जी-सी-ई समस्वरित था, कंपनी ने इसे गिटार और बेस का क्रॉस बताया.[33] येस कार्बन ने 10 और 12 तंत्री पर्दारहित उप-बेस गिटार विकसित किए.[34][35][36]

पिकअप और प्रवर्धन[संपादित करें]

पिकप पर अधिक जानकारी के लिए, देखें) पिकअप (संगीत प्रौद्योगिकी).

चुंबकीय पिकअप[संपादित करें]

ज्यादातर इलेक्ट्रिक बेस गिटार में चुंबकीय पिकअप का उपयोग होता है। चुंबकीय पिकअप में स्थायी चुंबक के चुंबकीय क्षेत्र के अंदर वाद्ययंत्र की धातु तंत्रियों के कंपन से चुंबकीय प्रवाह में छोटे परिवर्तन से पिकअप की कुंडलियों में सूत्रण होता है। यह बदले में कुंडलियों में छोटे विद्युत वोल्टेज पैदा करता है। ये निम्न स्तरीय संकेत तब प्रवर्धित होते हैं तथा एक स्पीकर के माध्यम से बजते हैं। 1980 के दशक के बाद से, बेस अक्सर बैटरी चालित "सक्रिय" इलेक्ट्रॉनिक्स, जो संकेतों को बढ़ावा देने, बढ़ावा देने पर समकारी नियंत्रण प्रदान करने या बेस और तीव्र आवृत्तियों को कम करने, या दोनों में कटौती करने के साथ उपलब्ध हैं।

गैर चुंबकीय पिकअप, जैसे पीजोइलेक्ट्रिक पिकअप आम तौर पर कम इस्तेमाल किए जाते हैं। पीजोइलेक्ट्रिक पिकअप एक चुंबकीय पिकअप की तरह तंत्री के साथ सीधे परस्पर क्रिया नहीं करते, लेकिन किसी यांत्रिक कंपन को संकेत में परिवर्तित करते हैं। वे आम तौर पर ब्रिज की काठी के नीचे या ब्रिज के पास आरोहित होते हैं और इष्टतम ध्वनि के लिए एक पूर्व प्रवर्धक की आवश्यकता है।

  • "जैज" पिकअप (मूल जैज फेंडर बेस के संदर्भ में), जिन्हें जे-पिकअप भी कहा जाता है, चौड़े आठ ध्रुवीय पिकअप हैं जो चारों तंत्रियों के नीचे स्थित हैं। जे-पिकअप आमतौर पर एकल-कुंडली डिजाइन के होते हैं, हालांकि बड़ी संख्या में हमबकिंग डिजाइन भी उपलब्ध हैं। जैसा कि पी-पिकअप के अर्द्ध के साथ होता है, जे-पिकअप विपरीत चुंबकीय ध्रुवता के साथ विपरीत-वाउंड होते हैं। परिणामतः जब एक ही तीव्रता पर उपयोग किया जाता है, तो उन में गुनगुनाहट निरस्त करने का गुण होता है, जब पिकअपों को असमान तीव्रता पर प्रयुक्त होते हैं तो यह निरस्तीकरण कम हो जाता है तथा प्रत्येक पिकअप के पृथक उपयोग पर बिलकुल गायब हो जाता है। 'जे-शैली' के पिकअप में "पी" शैली पिकअप से कम निर्गम और पतली ध्वनि होती है, जो इसे अधिकतर रॉक संगीत के लिए उपयुक्पीत बनाते हैं। कई बेसवादक अद्वितीय ध्वनि के लिए ब्रिज पर 'जे' पिकअप और गर्दन पर 'पी' पिकअप के संयोजन का चयन करते हैं।
  • "प्रिसिजन" पिकअप (मूल फेंडर प्रिसिजन बेस को संदर्भित करते हुए) जिन्हें "पी" पिकअप भी कहा जाता है, वास्तव में दो पृथक एकल-कुंडली पिकअप हैं। प्रत्येक बॉडी की लंबाई के साथ-साथ स्थापित है ताकि दोनों अर्द्ध तंत्रियों के नीचे रहें. पिकअप गुनगुनाहट को कम करने के लिए उलट-वाउंड विपरीत चुंबकीय ध्रुवता वाले होते हैं। यह 'पी' पिकअप को (हमबकिंग) एकल कुंडली पिकअप बना देता है, 'पी' शैली पिकअप के लिए कुछ लगभग अद्वितीय बनाता है। कम आम है मूल 1951 फेंडर प्रिसिजन बेस पर प्रयुक्त एकल कुंडली "पी" पिकअप.[37]
  • "दोहरी कुंडली" (हमबकर), जिसे “डीसी पिकअप” के नाम से भी जाना जाता है, में दो संकेत उत्पादक कुंडलियां होती हैं जो विपरीत ध्रुवता वाले चुंबकों के चारों ओर उलटी लिपटी हुई होती हैं (सिद्घांत रूप में दो अलग अलग जे-पिकअप के समान). इससे एकल कुंडली पिकअप की तुलना में यह महत्वपूर्ण ढंग से व्यतिकरण से शोर को कम कर देता है। हमबकर अक्सर एकल कुंडली पिकअप की तुलना में उच्च उत्पादन स्तर का उत्पाद देते हैं। दोहरी कुंडली पिकअप मुख्यतः दो किस्मों में आते हैं; चीनी मिट्टी या चीनी मिट्टी और इस्पात. केवल चीनी मिट्टी के चुंबक अपने चीनी मिट्टी और इस्पात समकक्षों की तुलना में अपेक्षाकृत कठोर ध्वनि देते हैं और इसलिए भारी रॉक शैली में सामान्यतः इनका अधिक प्रयोग किया जाता है।
    • म्यूजिक मैन श्रृंखला के बेसों में प्रयुक्त पिकअप प्रसिद्ध हमबकर है; प्रत्येक में चार बड़े ध्रुवखंडों सहित दो कुंडलियां होती हैं। इसी कारण इस शैली को "एमएम (MM)" पिकअप कहा जाता है, अनेक पश्च बाजार पिकअप निर्माता और कस्टम निर्माता इन्हीं पिकअपों का उपयोग करते हैं। सबसे सामान्य विन्यास है ब्रिज पर एक पिकअप, जैजबेस के समान स्थानन वाले दो पिकअप, या गरदन पर एक एकल-कुंडली पिकअप (अक्सर एक "जे") के साथ ब्रिज पर एक एमएम पिकअप. इन पिकअप को अक्सर "टैप" किया जा सकता है, अर्थात एक एकल कुंडली पिकअप के समान ध्वनि देने के लिए दो में से एक कुंडली को आवश्यक रूप से बंद किया जा सकता है।
  • "सोपबार" पिकअप का यह नाम उसका आकार साबुन की पट्टी का के समान होने के कारण रखा गया और मूलतः गिब्सन पी-90 गिटार पिकअप के लिए संदर्भित किया जाता है। शब्द का प्रयोग एक आयताकार आकार और जिसमें कोई दिखाई देने वाला ध्रुवखंड न हो, ऐसे पिकअप के लिए भी किया जाता है; इस श्रेणी में पड़ने वाले ज्यादातर पिकअप हमबकिंग हैं। वे सामान्यतः रॉक और मेटल शैलियों के लिए डिजाइन किये गये बेसों में पाए जाते हैं, जैसे गिब्सन, ईएसपी (ESP) गिटार और शेक्टर. 'सोपबार पिकअप' को 'विस्तारित आवास' भी कहा जाता है।

कई बेसों में सिर्फ एक पिकअप, आमतौर पर एक "पी" या सोपबार पिकअप, होता है। एक से अधिक पिकअप भी काफी आम हैं, दो सबसे आम विन्यास हैं एक "पी" गर्दन के पास और एक "जे" ब्रिज के पास (जैसे, फेंडर प्रिसिजन बेस विशेष, फेंडर प्रेसिजन बेस प्लस), या दो "जे" पिकअप (जैसे, फेंडर जैज). दो- "सोपबार" विन्यास भी बहुत आम है, विशेष रूप से मेक के आधार पर, जैसे इबानेज और यामाहा. एक जे या गर्दन पर अन्य एकल कुंडली पिकअप तथा ब्रिज में एक म्यूजिक मैन-शैली हमबकर का संयोजन बुटीक निर्माताओं के बीच लोकप्रिय हो गया है, एक बहुत ही स्पष्ट, संकेंद्रित स्वरक जो कि जैज और थम्बस्टाइल के लिए अच्छा है।

कुछ बेसों में और अधिक असामान्य पिकअप विन्यासों, जैसे एक सोपबार और एक "पी" पिकअप (कुछ फेंडरों पर पाया जाता है). स्टू हैम के “अर्ज”) बेस, जिनमें दो "जे" पिकअपों के बीच में एक "पी" पिकअप सैंडविच बना रहता है और बूट्सी कोलिन्स के कस्टम बेस जिनमें 5 तक जे पिकअप होते हैं, का उपयोग होता है। बिली शीहान द्वारा प्रयुक्त कुछ कस्टम बेसों में एक और असामान्य विन्यास पाया गया है जिनमें गरदन पर एक हमबकर तथा मध्य स्थान पर एक विभाजित कुंडली पिकअप है।

पिकअप के स्थानन ध्वनि को बहुत प्रभावित करता है। गर्दन के जोड़ के पास एक पिकअप मौलिक और नीची गुणावृत्ति पर जोर देता है और इस तरह एक गहरी, मंद्र ध्वनि पैदा करता है, जबकि ब्रिज के पास एक पिकअप उच्च क्रम गुणावृत्ति पर जोर देता है और एक "सख्त" या "तेज" ध्वनि बनाता है। आमतौर पर एकाधिक पिकअप के कारण पिकअपों के निर्गमों का मिश्रण होता है, दो पिकअपों के बीच विद्युतीय तथा ध्वनिक अन्योन्य क्रियाओं (जैसे आंशिक चरण निरस्तीकरण) जिसके कारण स्वरक प्रभावों की एक रेंज प्राप्त होती है।

गैर-चुंबकीय पिकअप[संपादित करें]

गैर-चुंबकीय पिकअप के उपयोग से बेस वादकों को अलौह तंत्रियों जैसे, नायलेन, पीतल या सिलिकॉन रबर, जो विविध स्वरकों की रचना करते हैं, का उपयोग करने की सुविधा मिलती है।

  • पीजोइलेक्ट्रिक पिकअप ("पीजो" पिकअप भी कहा जाता है) गैर चुंबकीय पिकअप होते हैं जिनमें ट्रांसड्यूसर क्रिस्टल का उपयोग तंत्रियों के कंपन को विद्युतीय संकेत में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है। वे चुंबकीय चुंबकीय पिकअप से अक्सर एक ध्वनिक बेस के समान एक अलग स्वर का उत्पादन करते हैं। पीजो पिकअप का अक्सर ध्वनिक बेस गिटार में उपयोग किया जाता है।
  • ऑप्टिकल पिकअप गैर-चुंबकीय पिकअप का एक और प्रकार है। वे तंत्री के कंपन का प्रकाशतः अनुगमन करने के लिए एक अवरक्त एलईडी (LED) का उपयोग करते हैं, जिसके कारण वे “गुंजन” या पारंपरिक चुंबकीय पिकअप के साथ जुड़े अत्यधिक अनुनाद के बिना उच्च तीव्रता के साथ कम-आवृत्ति के स्वरक का पुनरुत्पादन करते हैं। चूंकि ऑप्टिकल पिकअप उच्च आवृत्तियों या आघात ध्वनियों का अच्छी तरह से उद्ग्रहण नहीं करते, गायब आवृत्तियों को भरने के लिए इन्हें आमतौर पर पीजोइलेक्ट्रिक पिकअप के साथ जोड़ा जाता है। लाइटवेव सिस्टम्स ऑप्टिकल पिकअप के साथ बेस बनाता है।

प्रवर्धन और प्रभाव[संपादित करें]

मुख्य लेख : Bass instrument amplification

इलेक्ट्रिक गिटार की तरह इलेक्ट्रिक बेस गिटार को जीवंत प्रदर्शन के लिए अक्सर योजक रज्जु द्वारा एक प्रवर्धक और एक स्पीकर के साथ जोड़ा जाता है। इलेक्ट्रिक बेसवादक या तो एक "कोम्बो" प्रवर्धक, जिसमें एक ही कैबिनेट में एक प्रवर्धक और एक स्पीकर का संयोजन होता है, या एक प्रवर्धक और एक अलग स्पीकर कैबिनेट (या कई कैबिनेट) का उपयोग करते हैं। कुछ मामलों में जब बेस का उपयोग बड़े पैमाने पर पीए (PA) प्रवर्धन के साथ हो रहा हो, इसे सीधे "डीआई (DI)" या “डायरेक्ट बॉक्स” से जोड़ा जाता है, जो उनके संकेतों को सीधे एक मिश्रण कंसोल में भेजता है, जहां से वे मुख्य और मॉनीटर स्पीकर को जाते हैं। रिकॉर्डिंग में प्रवर्धित संकेत के लिए एक माइक्रोफोन सेटअप का उपयोग किया जाता है या डायरेक्ट बॉक्स सीधे रिकॉर्डिंग कंसोल को भरण करता है। कलाकार या निर्माता माइक्ड और प्रत्यक्ष संकेतों के मिश्रण का उपयोग भी कर सकते हैं।

विभिन्न बेस प्रभावों जैसे पूर्व प्रवर्धकों, “स्टॉम्प बॉक्स”-शैली के पैडलों और संकेत संसाधकों तथा प्रवर्धक और स्पीकर के विन्यास का उपयोग वाद्ययंत्र की मूल ध्वनि में परिवर्तन के लिए किया जा सकता है। 1990 के दशक तथा 21वीं सदी के पहले दशक में, तुल्यकारकों व अति उपयोग उपकरणों जैसे संकेत संसाधक और संपीड़क या सीमक तेजी से लोकप्रिय हो गए हैं। कोरस, स्फारण, कला-विस्थापन जैसे माडुलन प्रभावों तथा विलंब और पाशन जैसे समय प्रभावों का इलेक्ट्रिक गिटार की तुलना में बेस के साथ प्रायः कम ही उपयोग किया जाता है।

बजाने की तकनीक[संपादित करें]

बैठकर या खड़े होकर[संपादित करें]

अधिकतर बेस वादक बजाते समय खड़े रहते हैं, हालांकि बड़े जैज बैंड या लोक संगीत के रूप में ध्वनिक शैलियों जैसी बड़ी सामूहिक सेटिंग्स, में बैठकर बजाना भी स्वीकार किया जाता है। जाह वोबल जैसे बेस वादक बारी बारी से खड़े होकर व बैठकर बजाते हैं। यह वादक की प्राथमिकता का मामला है कि कौनसी अवस्था में उसे बजाने में अधिक आसानी होती है तथा बैड प्रधान उससे क्या अपेक्षा करता है। बैठी हुई अवस्था में दाहिने हाथ वाले वादक दाहुनी जांघ पर वाद्ययंत्र का संतुलन कर सकते हैं, या शास्त्रीय गिटार वादकों की तरह बायीं जांघ पर. बायीं जांघ पर संतुलन करने से आमतौर पर ऐसी स्थिति बनती है जैसे खड़ी स्थिति की नकल हो, इस प्रकार खड़ी और बैठी स्थितियों में अधिक अंतर नहीं रहता. दाहिनी जांघ पर बेस के संतुलन से उसकी गरदन और पर्दापटल तक, विशेषकर नीचे के पर्दों तक, उसकी संपूर्णता में बेहतर पहुंच मिलती है।

प्रदर्शन तकनीक[संपादित करें]

एक खड़े बेस (या डबल बेस) के विपरीत, इलेक्ट्रिक बेस गिटार को क्षैतिज शरीर से आड़ा पकड़ कर, एक इलेक्ट्रिक गिटार की तरह बजाया जाता है। उंगलियों से तंत्रियों को कर्षित करते समय (पिजिकातो) तर्जनी और मध्यमा (कभी-कभी अंगूठे, अनामिका और कनिष्ठा का भी) उपयोग किया जाता है। मोटाउन युग के प्रभावशाली बेसवादक जेम्स जेसर्सन सिर्फ अपनी तर्जनी से जटिल बेस धुनें बजाते थे, जिसे वे "द हुक" कहते थे। बेसवादक द्वारा दाएँ हाथ के (बाएं हाथ के खिलाड़ियों के मामले में बाएं अंगूठे) अंगूठे को रखे जाने की स्थिति में भिन्नताएं हैं। एक वादक अपना अंगूठा एक पिकअप के ऊपरी किनारे पर या पर्दापटल के पार्श्व में रख सकता है, जो कि खड़ी स्थिति में प्रभावी बेस वादकों में विशेष रूप से आम है। कुछ बेसवादक अपने अंगूठों को सबसे नीचे वाली तंत्री पर जमा देते हैं और निचली तंत्रियों को बजाने के लिए इन्हें हटाते हैं। वैकल्पिक रूप से, अंगूठे को अप्रयुक्त तंत्रियों को मूक करने के लिए उन पर शिथिलता से रखा जाता है।

तंत्री को ब्रिज और फ्रेटिंग हैंड जहां रखा है, उसके बाच में कहीं भी कर्षित किया जा सकता है, किस जगह कर्षण किया जाता है, इस आधार पर भिन्न-भिन्न स्वर उत्पन्न होते हैं। जैज संलयन बेसवादक जैको पास्टोरियस जैसे कुछ खिलाड़ी ब्रिज के नजदीक कर्षण करमे के लिए जाने जाते हैं, जहां कि तंत्री सबसे ज्यादा कसी हुई होती है, जबकि अन्य बेसवादक अंगुलिपटल के नजदीक तंत्री के ढीले हिस्से पर कर्षण करना पसंद करते हैं।

कई बेसवादक डबल बेस की ध्वनियों का अनुकरण करने के लिए अंगूठे से तंत्रियों का कर्षण करते हैं और "थम्पी" स्वर उत्पन्न करने के लिए हथेली से तंत्री को मूक करते हैं। स्वर्गीय मोंक मोंटगोमेरी (जिन्होंने लियोनेल हैम्पटन के बैंड में बजाया था) तथा ब्रूस पामर (जिन्होंने बफैलो स्प्रिंगफील्ड के साथ प्रदर्शन किया था) अंगूठे का उपयोग करते थे। अंगूठे के उपयोग को फेंडर के शुरुआती मॉडलों में मान्यता दी गई, जो तंत्रियों के नीचे पिकगार्ड से जुड़े "थम्बरेस्ट" या "टगबार" के साथ पेश किए गए थे। अपने नाम के विपरीत, इस का उपयोग अंगूठे आराम देने के लिए नहीं किया जाता था, बल्कि अंगूठे से तंत्रियों के कर्षण के समय टेक का काम करता था। 1970 के दशकों के मॉडलों में थम्बरेस्ट तंत्रियों के ऊपर ले जाया गया था और 1980 के दशक में हटा ही दिया दिया.

"स्लैप और पॉप"[संपादित करें]

मुख्य लेख : Slapping

स्लैप और पॉप विधि, या "अंगूठा शैली" सर्वाधिक फंक से संबद्ध है और अंगूठे से तंत्री पर आघात, थंपिंग या स्लैपिंग से अथवा तर्जनी या मध्यमा से स्नैपिंग (या "पॉपिंग") के द्वारा स्वरकों और आघात स्वरों को उत्पन्न करते हैं। बेसवादक तीव्र आघाती प्रभाव के लिए अक्सर बाएं हाथ से मूक किए गए "मृत स्वरों" का स्लैप और पॉप के बीच में अंतर्वेशन करते हैं और स्वर को स्लैप या पॉप किए जाने के बाद फ्रेटिंग हैंड से "हैमर ऑन", "पुल ऑफ" या एक बाएं हाथ के ग्लिसांडो (स्लाइड) के द्वारा अन्य स्वर उत्पन्न किए जाते हैं। स्लाई एंड द फैमिली स्टोन और ग्राहम सेंट्रल स्टेशन के लैरी ग्राहम स्लैप शैली के प्रारंभिक प्रवर्तक थे और द ब्रदर्स जॉनसन के लुइस जॉनसन को भी स्लैप वादक के रूप में जाना जाता है।

कई बेसवादकों द्वारा स्लैप और पॉप शैली का उपयोग अन्य विधाओं जैसे रॉक (उदाहरण के लिए जे. जे. बरेनेल और लेस क्लेपूल), मेटल (उदाहरण के लिए एरिक लैंगलुइस, मार्टिन मेंडे़ज, फील्डी और रियॉन मार्टिन) तथा फ्यूजन (उदाहरण के लिए मार्कस मिलर, विक्टर वूटन और एलैन कैरोन) में भी किया। स्लैप शैली के वादन को पूरे 1980 के दशक और 1990 के दशक के आरंभ में पॉप बेस वादकों जैसे मार्क किंग (लेवल 42 से) और रॉक बेसवादकों जैसे पिनो पलाडिनो (वर्तमान में जॉन मायर ट्रायो के सदस्य तथा द हू के बेसवादक),[38] फ्ली (रेड हॉट चिली पेपर्स से) तथा एलेक्स काटुनिच (इनक्यूबस से) ने लोकप्रिय बनाया. वूटन ने "डबल स्ट्रोक" को लोकप्रिय बनाया जिसमें अपस्ट्रोक तथा डाउनस्ट्रोक के समय दो बार तोत्री को स्लैप किया जाता है (अधिक जानकारी के लिए, देखें क्लासिकल थम्प) स्लैपिंग से संबंधी एक शायद ही कभी प्रयुक्त होने वाली तकनीक है लकड़ी के डॉवेल का उपयोग "फंक फिंगर्स" एक विधि जिसे टोनी लेविन ने लोकप्रय बनाया था।

पिकिंग तकनीक[संपादित करें]

पिक (या जव्वा) का उपयोग अधिक सुस्पष्ट आघात के लिए, गति के लिए या सिर्फ व्यक्तिगत वरीयता के कारण किया जाता है। हालांकि एक पिक का उपयोग प्राथमिक रूप से रॉक के साथ जुड़ा है, पिक का अन्य शैलियों में भी इस्तेमाल किया जाता है। जैज बेसवादक स्टीव स्वैलो पिक का उपयोग अपबीट या फंकी गानों के लिए तथा पिंक फ्लायड के बेसवादक रॉजर वॉटर्स इसका उपयोग भारी स्वर के लिए करते हैं। पिक का उपयोग अधिक सुसंगत आघात के लिए एकांतर डाउनस्ट्रोक और अपस्ट्रोक या सभी डाउनस्ट्रोक में किया जाता है। पिक को आमतौर पर अंगूठे और तर्जनी से पकड़ा जाता है कलाई की ऊपर-नीचे गति के साथ प्लकिंग की जाती है।

पिक के कई प्रकार उपलब्ध हैं, किंतु इलेक्ट्रिक बेस की मोटी और भारी तंत्रियों के कारण बेसवादक इलेक्ट्रिक गिटार के लिए प्रयुक्त होने वाले पिक से भारी पिक का उपयोग करना पसंद करते हैं। पिक के लिए विभिन्न सामग्रियों जैसे प्लास्टिक, नायलॉन और फेल्ट जो सभी भिन्न भिन्न स्वर उत्पन्न करते हैं, का उपयोग किया जाता है। एक फिंगरस्टाइल स्वर का अनुकरण करने के लिए फेल्ट पिक का उपयोग किया किया जाता है।

हथेली चुपकरण तकनीक[संपादित करें]

हथेली चुपकरण एक व्यापक रूप से प्रयोग की जाने वाली बेस तकनीक है। पिकिंग के समय पिकिंग हाथ की हथेली ब्रिज पर विश्राम करती है तथा स्वर की दीर्घता को कम करते हुए उसका चुपकरण करती है। हथेली को जितना जोर से दबाया जाएगा, या जितना अधिक तंत्रियों का क्षेत्र हथेली स्पर्श करेगी उतना ही तंत्री के कंपन ती अवधि कम होगी. बजाए गए स्वर की अवधि किसी भी स्वर के लिए बदली जा सकती है। कम अवधि के चुप किए गए इलेक्ट्रिक बेस के स्वर को एक खड़े बेस की स्वर अवधि और गुण के लिए नकल की जा सकती है। आमतौर से एक पिक का उपयोग करते समय हथेली चुपकरण का उपयोग किया जाता है, किंतु पिक के बिना भी इसका उपयोग अंगूठे से डाउनस्ट्रोक बजाते समय किया जा सकता है।

पिक/हथेली चुपकरण संयोजन का एक प्रसिद्ध उदाहरण है पॉल मकार्टनी, जिन्होंने इस तकनीक का दशकों तक उपयोग किया। स्टिंग भी हथेली चुपकरण का उपयोग करता है, लेकिन अक्सर ऐसा बिना पिक के करता है, एक अंगूठे और एक उंगली से बजाकर.

पिक/हथेली चुपकरण संयोजन भी सामान्यतः गिटार पर प्रयुक्त होता है।

अंगुलिचालन तकनीक[संपादित करें]

फ्रेटिंग हैंड- दाहिने-हाथ वाले बेसवादक के लिए बायां हाथ और बाएं हाथ के बेस वादक के लिए दाहिना हाथ-तंत्रियों को दबा कर विभिन्न स्वर उत्पन्न करने और प्लकिंग या पिकिंग से उत्पन्न स्वरों का लय और ध्वनि-गुणता को आकार देने के लिए उपयोग किया जाता है। फ्रेटिंग हैंड का उपयोग एक बजाए गए स्वर को, या तो पूरी तरह चुप करने या प्लकिंग अथवा पिकिंग के बाद उसकी अवधि कम करने के लिए या स्वर की तीव्रता कम करने के लिए ब्रिज के पास आंशिक चुपकरण करने के लिए, या स्वर को तेजी से समाप्त होने देने के लिए किया जाता है। खासकर जब वादक एक "सूखी" या "केंद्रित" ध्वनि करना चाहता है, तो अक्सर नहीं बजाई जा रही तंत्रियों को चुप करने और अनुकंपी कंपनों को रोकने के लिए फ्रेटिंग हैंड का उपयोग किया जाता है। दूसरी ओर, संबंधित तंत्री की अनुकंपी प्रतिध्वनि की किसी गीत के लिए जरूरत हो सकती है जैसे गाथा-गीतिका. इन मामलों में, एक बेसवादक संबंधित स्वरों को हारमोनिकली फ्रेट कर सकता है। उदाहरण के लिए, जबकि एक निरंतर "एफ" बजाया जाता है ('डी' तंत्री के तीसरे चालन पर), नीचे एक एफ सरगम एक पियानो खिलाड़ी द्वारा बजाया जा रहा है, एक बेसवादक इस सुर के नीचे 'सी' और नीचे 'एफ' को पकड़ सकता है जिससे उनके गुणित स्वरों की अनुकंपी ध्वनि निकलती है।

फ्रेटिंग हैंड एक प्लक या पिक किए स्वर में प्रकंपन, या तो एक सौम्य, संकीर्ण प्रकंपन या एक अधिक अतिरंजित बड़ी तारता के साथ, व्यापक प्रकंपन जोड़ सकता है। पर्दायुक्त बेसों के लिए, प्रकंपन हमेशा स्वर की तारता और एक थोड़ी उच्च तारता के बीच एक प्रत्यावर्तन है। पर्दारहित बेसों के लिए, वादक प्रकंपन की इस शैली का उपयोग कर सकते हैं या वे स्वर और एक थोड़ी कम तारता के बीच प्रत्यावर्तन कर सकते हैं। जबकि प्रकंपन ज्यादातर "रोके गए" स्वरों- अर्थात वे स्वर जिन्हें अंगुलिपटल पर दबाया गया है- खुली तंत्रियों को भी तंत्री को नट के पीछे दबा कर प्रकंपित किया जा सकता है। साथ ही, फ्रेटिंग हैंड का उपयोग एक प्लक या पिक किए गए स्वर को ऊपर तारता में "मोड़ने" के लिए किया जा सकता है। एक विपरीत प्रभाव "बेंड डाउन" उत्पन्न करने के लिए, प्लक या पिक करने से पहले तंत्री को ऊंची तारता तक धकेला जाता है और तब बजने के बाद इसे नियमित तारता तक गिरने दिया जाता है। शायद ही कभी, एक बेसवादक समान प्रभाव उत्पन्न करने के लिए एक ट्रिमोलो बार-सज्जित बेस का उपयोग करता है।

एक समय में एक ही स्वर दबाने के अलावा, बेसवादक एक स्वर-संघात का प्रदर्शन करने के लिए अपने फ्रेटिंग हैंड से एक बार में कई स्वरों को भी दवा सकते हैं। जबकि इलेक्ट्रिक गिटारवादकों की तुलना में बेसवादकों द्वारा स्वर-संघातों का कम ही उपयोग किया जाता है, इलेक्ट्रिक बेस, खासकर ऊंची रेंज वाले, जैसे छः-तंत्री बेसों पर विविध स्वर-संघातों का प्रदर्शन किया जा सकता है। एक तंत्री को पूरी तरह नीचे दबाने का एक और रूपांतर है, आहिस्ता से तंत्री को हार्मोनिक नोड बिंदु पर झंकृत करना, जिससे झंकार जैसा ऊपरी गुणित स्वर उत्पन्न होता है। मीड़ (ग्लिसांडो) एक प्रभाव है जिसमें फ्रेटिंग हैंड गरदन पर ऊपर या नीचे सरकता है। तंत्री को प्लक या पिक किए बिना, फ्रेटिंग हैंड की गति से ही एक सूक्ष्म मीड़ का प्रदर्शन किया जा सकता है और अधिक सुस्पष्ट प्रभाव के लिए तंत्री को पहले प्लक या पिक किया जाता है, या, एक मेटल या हार्डकोर पंक के संदर्भ में, तंत्री के पार्श्व के साथ एक पिक को स्क्रेप किया जाता है।

फ्रेटिंग हैंड का उपयोग स्वर बजाने के लिए भी किया जा सकता है, या तो एक खुली तंत्री को फ्रेटिंग हैंड से प्लक करके, या पहले से प्लक या पिक की हुई तंत्री के मामले में ऊंची तारता पर “हैमरिंग ऑन” करके या एक नीचे फ्रेटेड अथवा खुली तंत्री के स्वर को प्लक करने के लिए "पुलिंग ऑफ" करके. जैज बेसवादक फ्रेटिंग हैंड का एक सूक्ष्म रूप पिजिकाटो, प्लकिंग हैंड से तंत्री बजाने से ठीक पहले फ्रेटिंग हैंड से खुली तंत्री पर एक बहुत ही संक्षिप्त कण स्वर प्लक करके, उपयोग करते हैं। जब एक तंत्री पर तेजी से हैमरिंग की जाती है, स्वर को एक ट्रिल में लंबे समय तक विलंबित किया जा सकता है।

दो-हाथ दोहन[संपादित करें]

दो हाथ दोहन शैलियों में बेसवादक पर्दापटल पर तेजी से तंत्रियों को दबाकर और पकड़कर स्वर बजाने के लिए दोनों हाथों का उपयोग करते हैं। इस तकनीक में, ध्वनि उत्पन्न करने के लिए तंत्री के प्लकिंग या पिकिंग की बजाय तंत्री को फ्रेट या फ्रेटबोर्ड से टकराकर ध्वनि उत्पन्न की जाती है। चूंकि फ्रेटबोर्ड पर दोनों हाथों का प्रयोग किया जा सकता है, इससे मिले हुए आनुषंगिक सुरों को बजाना, एक साथ एक बेसलाइन और एक सरल स्वर संघात बजाना या स्वर संघाक और विस्तृत स्वर संघात बजाना संभव हो पाता है। द हू के बेसवादक जॉन एंटविसल तंत्रियों पर प्रहार करके उन्हें एक झंकार के साथ फ्रेटबोर्ड पर टकराकर ड्रम-शैली के पूरण उत्पन्न करते थे। इस शैली के उल्लेखनीय वादकों में शामिल हैं बिली शीहान, स्टुअर्ट हैम, जॉन म्युंग, विक्टर वूटन, लेस क्लेपूल, मार्क किंग तथा माइकल मैनरिंग. द चैपमैन स्टिक और वॉर गिटार्स दो हाथ दोहन करके बजाने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए तंत्री वाद्य हैं।

उपयोग[संपादित करें]

लोकप्रिय संगीत[संपादित करें]

लोकप्रिय संगीत बैंड और रॉक समूह बेस गिटार का उपयोग लय अनुभाग के सदस्य के रूप में करते हैं, जो स्वर संघात श्रृंखला या वर्धन प्रदान करते हैं और गीत के लिए बीट सेट करते हैं। लय अनुभाग में आमतौर पर एक लय गिटार वादक या इलेक्ट्रिक कुंजीपटल वादक, या दोनों, एक बेस गिटार वादक और एक ड्रम वादक होते हैं, बड़े ग्रुपों में अतिरिक्त गिटार वादक, कुंजीपटल वादक या आघातक शामिल किए जा सकते हैं।

बेस गिटार वादक द्वारा प्रदर्शित बेसलाइनों के प्रकार संगीत की एक शैली से दूसरी में व्यापक रूप से बदलते रहते हैं। बेसलाइन की शैलियों में अंतरों के बावजूद, लोकप्रिय संगीत की अधिकतर शैलियों में एक बेस गिटार वादक एक समान भूमिका पूर्ण करता हैः हार्मोनिक ढांचे को मजबूत करना (प्रायः स्वर संघात वर्धनों के मूलों पर जोर देकर) और बाट स्थापित करना (ड्रमवादक के सहयोग से). बेस गिटारवादक और बेस लाइन का महत्व संगीत की विभिन्न शैलियों में अलग-अलग होता है। 1980 के दशक के युग के पॉप और संगीत थियेटर जैसी कुछ पॉप शैलियों में, बेस कभी कभी एक अपेक्षाकृत सरल भूमिका निभाता है और संगीत में गायक और धुन वाद्ययंत्र आगे रहते हैं। इसके विपरीत, रेगे, फंक या हिप-हॉप में, पूरा गीत बेस पर केंद्रित हो सकता है तथा आमतौर पर इस मिश्रण में बेसलाइन बहुत प्रमुख होती है।

पारंपरिक देशी संगीत शैलियों में फोक रॉक और संबंधित शैलियों में, बेस अक्सर मूल तथा हर स्वर-संघात के पंचम को बजाता है। शिकागो ब्लूज़ में, इलेक्ट्रिक बेस अक्सर ठाठ औक विस्तृत स्वर संघातों से बनी बेसलाइन घूमकर प्रदर्शित करते हैं। ब्लूज़ रॉक बैंड में बेसवादक अक्सर ब्लूज स्केल आधारित टुकड़ों और चगिंग बूगी-शैली लाइनों को बजाता है। मेटल में, बेस गिटार लय गिटार वादक के साथ जटिल टुकड़ों को बजाता है या समूह की आवाज को स्थायित्व देने के लिए एक नीचे रम्बलिंग पेडल बिंदु पर बजाते हैं।

बेस गिटारवादक कभी कभी सख्त लय अनुभाग से बाहर निकल कर बेस ब्रेक्स या बेस एकल का प्रदर्शन भी करते हैं। बेस ब्रेक्स या बेस एकल के लिए प्रयुक्त बेसलाइनें शैली के अनुसार परिवर्तित होती हैं। रॉक बैंड में, एक बेस ब्रेक में बेसवादक गीत में ठहराव के समय एक रिफ या लिक शामिल हो सकते हैं। मेटल की शैलियों में से कुछ में, एक बेस ब्रेक में बेस पर "श्रेड गिटार"- स्टाइल टैपिंग शामिल हो सकती है। एक फंक या फंक रॉक बैंड में, बेसवादक के आघाती स्लैप और पॉप वादन का नमूना एकल बेस में मिल सकता है। प्रगतिशील रॉक, आर्ट रॉक या प्रगतिशील मेटल में, बेस गिटार वादक मुख्य गिटार वादक (या गायक) के साथ धुन लाइनें बजा सकता है और विस्तृत गिटार एकल प्रस्तुत कर सकता है। अन्य समकालीन संगीतकारों जैसे एडो कैस्ट्रो ने 4,5,6,7,8 और 9 तंत्री सहित इलेक्ट्रिक बेस को लेकर एक नई शैली विकसित की है जो पूरी तरह पेस के आसपास केंद्रित है।

जैज और जैज फ्यूजन[संपादित करें]

इलेक्ट्रिक बेस जैज की दुनिया के लिए अपेक्षाकृत नवागंतुक है। 1930 और 1940 के दशकों के स्विग युग के बड़े बैंड और 1950 के दशक के संयोजन कोम्बो बिहोप और हार्ड बॉप गतिविधियों, सभी में डबल बेस प्रयुक्त हुआ था। इलेक्ट्रिक बेस 1960 के दशक के अंत तथा 1970 के दशक के आरंभ में पेश किया गया था तब रॉक प्रभावों को जैज के साथ मिश्रित कर जैज रॉक संलयनक की रचना की गई। जैज संलयन में इलेक्ट्रिक बेस के पेश होने से, रॉक दुनिया की भांति, बेस को भी उच्च तीव्रता तथा शक्तिशाली प्रवर्धकों के साथ स्टेडियम संगीत समारोहों में उपयोग किया जा सकता है, क्योंकि एक डबल बेस की तुलना में एक इलेक्ट्रिक बेस को प्रवर्धित करना बहुत आसान है (उच्च तीव्रता सेटिंग में इलेक्ट्रिक बेस में फीडबैक की प्रवृत्ति है). जैज में इलेक्ट्रिक बेस की संगत और एकल दोनों भूमिकाएं हैं। संगत में, बेसवादक पारंपरिक धुनों और जैज मानकों के लिए डबलबेस की नकल में कोमल क्वार्टर नोट लाइनें बजाकर घूमते हुए बेसलाइन का प्रदर्शन कर सकता है। लैटिन और साल्सा धुनों तथा रॉक-प्रभावित जैज संलयन धुनों के लिए इलेक्ट्रिक बेसवादक ड्रमवादक के समन्वय में तेज, तालपरिवर्तित, लयबद्ध धुनें बजा सकता है या नीची, भारी ग्रूव रख सकता है।

अन्य अधिकतर लोकप्रिय शैलियों की तुलना में एक जैज सेटिंग में, इलेक्ट्रिक बेस के लिए एक अधिक प्रशस्त एकल भूमिका है। अधिकतर रॉक सेटिंग्स में, बेस गिटारवादक को एक संगीत कार्यक्रम के दौरान केवल कुछ ही संक्षिप्त बेस ब्रेक या संक्षिप्त एकल एक मिलते हैं। एक जैज संगीत कार्यक्रम के दौरान, एक जैज बेसवादक लंबे परिवर्धित एकल मिल सकते हैं जिन्हें जैज की भाषा में "उड़ानें" कहा जाता है। जैज बेसवादक संगत कर रहे हों या एकल प्रस्तुति दे रहा हो, आमतौर पर उनका उद्देश्य एक लयबद्ध ड्राइव और "समयानुभूति" उत्पन्न करना होता है जिनसे "स्विंग" और "ग्रूव" की भावना बनती है। उल्लेखनीय जैज बेसवादकों की जानकारी के लिए, जैज बेसवादकों की सूची आर्टिकल देखें.

समकालीन शास्त्रीय संगीत[संपादित करें]

समकालीन शास्त्रीय संगीत पश्चिमी कला संगीत के मानक वाद्यों (पियानो, वायलिन, डबल बेस, आदि) तथा नए वाद्यों या ध्वनि उत्पादक उपकरणों या विद्युत से प्रवर्धित वाद्यों से लेकर टेप प्लेयर तथा रेडियो तक का प्रयोग करता है। 1960 के बाद से इलेक्ट्रिक बेस गिटार कभी कभी ही समकालीन शास्त्रीय संगीत (कला संगीत) में इस्तेमाल किया गया है। समकालीन संगीतकारों ने अक्सर गैर पारंपरिक (या अपरंपरागत) उपकरणों या वादन तकनीकों के उपयोग के माध्यम से असामान्य ध्वनियां या वाद्य स्वरक प्राप्त किए. इस प्रकार, समकालीन शास्त्रीय संगीत बजाने वाले बेस गिटार वादक को वाद्य को असामान्य विधि से प्लक या स्ट्रम करने के लिए निदेशित किया जा सकता है।

1960 के दशक में इलेक्ट्रिक बेस का उपयोग करने वाले अमेरिकी संगीतकारों में शामिल थे प्रयोगात्मक शास्त्रीय संगीत के संगीतकार क्रिस्चियन वोल्फ (जन्म 1934) (इलेक्ट्रिक स्प्रिंग 1, 1966; इलेक्ट्रिक स्प्रिंग 2, 1966/70; इलेक्ट्रिक स्प्रिंग 3, 1967; और अनाम 1996); येल विश्वविद्यालय में पॉल हिंडेमिथ के शिष्य, फ्रांसिस थोर्न (जन्म 1922) जिन्होंने (लीबरस्टॉक 1968-69); और क्रिज्सतोफ पेंदेरेस्की (सेलो कोन्सरतो नं.1 1966/67, पुनः 1971/72), द डेविल्स ऑफ लाउदुन, 1969; कोसमोगोनिया, 1970 और पारतिता, 1971), लुइस एंद्रिएसेन (स्पेक्तेकल, 1970; डे स्टाट, 1972-76; होकेटस, 1976; डे तिज्ड, 1980-81 और डे मेतेरी, 1984-88). 1960 के दशक में बेस गिटार का उपयोग शुरू करने वाले यूरोपीय संगीतकारों में शामिल थे, पेले गुडमंडसेन-होमग्रीन (जन्म 1932) सिम्फनी पा रिगमार्वन, 1966; रिरिप्राइजर, 1967; और पीस बाई पीस, 1968); इरविन ब्रेजलोन (चर्चिल डाउन्स, 1970).

1970 के दशक में, इलेक्ट्रिक बेस अमेरिकी कंडक्टर-संगीतकार लियोनार्ड बर्नस्टीन (1918-1990) ने अपने एमएएसएस (MASS), 1971 के लिए उपयोग किया। अमेरिकी जैज पियानोवादक डेव ब्रूबैक ने बेस गिटार का उपयोग अपने 1971 की रचना ट्रुथ हैज फॉलन में किया था। रूसी और सोवियत संगीतकार अल्फ्रेड श्नित्के ने अपनी सिम्फनी नं.1 1972 में वाद्य का उपयोग किया। 1977 में, दाऊद अम्राम (जन्म 1930) ने एन मेमोरिया डे चानो पोजो में इलेक्ट्रिक बेस के लिए स्कोर किया। अम्राम एक अमेरिकी संगीतकार है और जैज, जातीय और लोक संगीत के उदार उपयोग के लिए मशहूर हैं।

1980 और 1990 के दशक में इलेक्ट्रिक बेस का उपयोग हैंस वर्नर हेंज (एल रे डे हरलेम, 1980; और।। रिटोमो डियूलिसे इन पैट्रिया, 1981), हैरोल्ड शेपेरो, ऑन ग्रीन माउंटेन (चकोने आफ्टर मोंटेलर्दी), 1957, ऑर्केस्ट्रेटेड 1981; स्टीव रीक की इलेक्ट्रिक काउंटरपॉइंट (1987), वोल्फगैंग रिम (दिए इरोबेरंग वोन मेक्सिको, 1987-91), अर्वो पार्ट (मिसेरेरे, 1989/92), स्टीव मार्टलैंड (डांसवर्क्स, 1993; और हॉर्सेज ऑफ इंसट्रक्शन, 1994), सोफिया गुबैदुलिना (ऑस डेम स्टूडेंबच, 1991), गिया कंचेली (विंगलेस, 1993), जॉन एडम्स (आई वॉज लुकिंग एट द सीलिंग और देन आई सॉ द स्काई, 1995; और स्क्रैचबैंड, 1996/97 और माइकल नायमैन (माइकल नायमैन बैंड के बहुत सारे काम).

शिक्षण और प्रशिक्षण[संपादित करें]

इलेक्ट्रिक बेस के लिए अध्यापन और प्रशिक्षण शैली और देश के अनुसार व्यापक रूप से भिन्न होता है। 1950 और 1960 के दशकों से रॉक और पॉप बेस के अध्यापन का एक इतिहास है, जब वाद्य सीखने में छात्रों की सहायता के लिए विधि पुस्तकों का विकास किया गया। एक उल्लेखनीय विधि पुस्तक थी कैरोल के की हाऊ टु प्ले द इलेक्ट्रिक बेस .

जैज दृश्य में, चूंकि बेस गिटार की अधिकांशतः वही भूमिका है जो डबल बेस की है- लय की स्थापना करना और हारमोनिक बुनियाद की रूपरेखा बनाना- इलेक्ट्रिक बेस वादकों ने बेस गिटार विधियां तथा जैज डबल बेस विधियां दोनों पुस्तकों का उपयोग किया। इलेक्ट्रिक बेस वादकों द्वारा जैज में जैज डबल बेस विधियां पुस्तकों के उपयोग से यह सुविधा है कि जैज विधियां वाद्य को पकड़ने या प्लक करने के तरीकों की बजाय तकनीक में सुधार पर जोर (जैसे बेसलाइनों पर घूमने में कैसे सुधार करना है) तथा लयात्मक अभ्यास मिलता है।

औपचारिक प्रशिक्षण[संपादित करें]

साँचा:Cleanup-spam सभी शैलियों में से, जैज और मुख्यधारा की वाणिज्यिक शैलियों (रॉक, आर एंड बी, आदि) के इलेक्ट्रिक बेस के अनुदेशन और प्रशिक्षण हेतु सबसे ज्यादा स्थापित और व्यापक सिस्टम हैं। जैज के मामले में, किशोर हाई स्कूल के या समुदाय द्वारा चलाए गे शौकिया बड़े बैंड में निजी पाठ लेना शुरू कर सकते हैं। जो युवा वयस्क पेशेवर जैज बेसवादक या स्टूडियो रॉक बेसवादक बनने की ख्वाहिश रखते हैं वे कॉलेजों और कुछ विश्वविद्यालयों सहित औपचारिक प्रशिक्षण सेटिंग्स में अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं।

अमेरिका में कई कॉलेज इलेक्ट्रिक बेस प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। लॉस एंजिल्स में संगीतज्ञ संस्थान के हिस्से के रूप में 1978 में द बेस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी (बीआईटी) की स्थापना हुई थी। चक रेनी (एरीथा फ्रेंकलिन) और मारविन गाये के इलेक्ट्रिक बेस वादक) बीआईटी के पहले निदेशक थे। इलेक्ट्रिक बेस वादकों के लिए बीआईटी सबसे पुराना पेशेवर प्रशिक्षण कार्यक्रम है। कार्यक्रम फंक, रॉक, जैज, लैटिन और आर एंड बी सहित आधुनिक शैली की एक श्रृंखला सिखाता है।

बोस्टन में द बर्कली कॉलेज ऑफ म्यूजिक इलेक्ट्रिक बेस वादकों को प्रशिक्षण प्रदान करता है। इलेक्ट्रिक बेस छात्रों को निजी सबक मिलता है और वहाँ पर चुनने के लिए 270 से अधिक समूहों के विकल्प हैं। विशिष्ट इलेक्ट्रिक बेस पाठ्यक्रमों में बेस के लिए फंक/फ्यूजन शैलियां, इलेक्ट्रिक बेस के लिए स्लैप तकनीक, आप एंड बी की अंगुलिचालन शैली; पांच- और छः-तंत्री इलेक्ट्रिक बेस वादन (स्वर-संघात प्रदर्शन सहित); और बेस शीट संगीत को कैसे पढ़ा जाता है, शामिल हैं।[39] बर्कली कॉलेज के पूर्व छात्रों में शामिल हैं जेफ एंड्रयूज, विक्टर बेली, जेफ बर्लिन, माइकल मैनरिंग और नील स्टूबेनहॉस.[39] बेस विभाग में बेस एम्प्स सहित कक्षा के लिए दो कमरे हैं तथा ऑडियो रिकॉर्डिंग गियर से सुसज्जित दस निजी सबक स्टूडियो हैं। बेस विभाग के 2009 के अध्यक्ष, रिच एप्पलमैन ने कहा कि 'नए परिवर्तनों और विकास की बराबर जानकारी रखते हुए परंपरागत कौशल और प्रदर्शनों की सभी विधाओं का संतुलन जरूरी है। यह संतुलन चार, पांच और छह तंत्री इलेक्ट्रिक बेस, पर्दारहित बेस और ध्वनिक बेस के लिए पाठ्यक्रम में पाया जा सकता है। पुरानी रॉक, जैज और संलयन शैलियों की नींव बनाए रखते हुए छात्र लैटिन, फंक, मोटाउन और हिप-हॉप की अवधारणाओं को सीखते हैं।[39]

सिएटल, वाशिंगटन में संगीत उपकरण आविष्कारक पॉल टट्मार्क अपनी संगीत की दुकान के बाहर
दूसरी पीढ़ी प्रेसिजन बेस के लिए लियो फेंडर को डिजाइन पेटेंट जारी हुआ
एक मानक फेंडर जैज बेस (आगे और पीछे के विचार)
मेपल फ्रेटबोर्ड के साथ 1970 दशक के फेंडर जैज़ बेस
1980 के दशक के युग में स्टिंबर्गर हेडलेस बेस
फ्लैटवाउंड तंत्रियों के साथ एक पर्दारहित बेस; ध्यान दें सही तारता खोजने में कलाकार की सहायता के लिए मार्कर्स अंगुलिपटल के पार्श्व में लगे हैं।
पैस्टोरीयस, कन्वोकेशन हॉल, टोरोंटो नवंबर, 27, 1977 फोटो: जीन-ल्यूक अवर्लिन
ट्यूनिंग मशीनें बेस गिटार की गर्दन पर हैडस्टॉक के पीछे आरोहित हैं; कुंडलाकार मेटल वॉर्म गियर पर ध्यान दें.
वॉशबर्न एक्सबी600, एक छह तंत्री बेस
एक सात स्ट्रिंग फ्रेटलेस बेस
दोहरी "जे"-स्टाइल पिकअप्स
यह प्रवर्धन सेटअप एक "बैकस्टैक" प्रस्ताव है, जिसमें एक एम्पलीफायर (इस मामले में हर्टके 5000 है) अलग स्पीकर कैबिनेट्स से जुड़ा हुआ है।
स्टैनली क्लार्क और मार्कस मिलर के साथ बेस वादक विक्टर वूटेन ने एसएमवी (SMV) नामक एक बेस ट्रायो में प्रदर्शन किया।
बेस वादक जाह वोबल अक्सर बैठकर बजाते थे
फंक रॉक बैंड रेड हॉट चिली पेपर्स से फ्ली अपनी आघात करने की स्लैपिंग तकनीक के उपयोग के लिए जाना जाता है।
अंडरओथ के ग्रांट ब्रैंडेल
आयरन मेडेन के बेस वादक स्टीव हैरिस अपने तेज़ बेस "गैलप्स" के लिए जाने जाते हैं
एक बेसवादक टैपिंग का प्रदर्शन करते हुए, जिसमें तंत्रियों को फ्रेटबोर्ड से टकराने पर स्वर उत्पन्न होते हैं।
मेटल बैंड मेटालिका के साथ बेस वादक रॉबर्ट ट्रूजिलो ने प्रदर्शन किया
2008 में जैज़ समूह "फाइव पिस बैंड" में डबल बेस वादक और इलेक्ट्रिक बेस वादक क्रिस्चन मैकब्राइड ने प्रदर्शन किया
1989 में अपने सिम्फनी नंबर के लिए प्रियोग किया गया रूसी और सोवियत संगीतकार अल्फ्रेड शिनिटके का प्रदर्शन हुआ1 (1972).

The music of the Indian subcontinent is usually divided into two major traditions of classical music: Hindustani music of North India and Karnatak music of South India, although many regions of India also have their own musical traditions that are independent of these.

Both Hindustani and Karnatak music use the system of ragas—sets of pitches and small motives for melody construction—and tala for rhythm. Ragas form a set of rules and patterns around which a musician can create his or her unique performance. Likewise, tala is a system of rhythmic structures based on the combination of stressed and unstressed beats. Within these rhythmic structures, musicians (1996.100.1) can create their own rhythmic patterns building off the compositional styles of others.

One of the main differences between North Indian and South Indian music is the increased influence of Persian music and musical instruments in the north. From the late twelfth century through the rise of British occupation, North India was under the control of a Muslim minority that was never able to extend its sphere of influence to South India. During this time, the music of North India began to acquire and adapt to the presence of Persian language, music, and musical instruments, such as the setar, from which the sitar got its name; the kamanche (1998.72) and santur, which became popular in Kashmir; and the rabab (alternately known as rebab and rubab), which preceded the sarod. New instruments were introduced, including the tabla and sitar (1999.399), which soon became the most famous Indian musical instruments worldwide. Legend has it that the tabla was formed by splitting a pakhavaj drum in half, with the larger side becoming the bayan and the smaller side the dahini. The barrel-shaped pakhavaj drum, which was the ancestor of both the tabla and the mrdangam, has been depicted in countless paintings and prints. New genres of music were formed as well, such as khyal and qawwali, that combine elements of both Hindu and Muslim musical practice.

Hindustani classical music is known largely for its instrumentalists, while Karnatak classical music is renowned for its virtuosic singing practices. Instruments most commonly used in Hindustani classical music are the sitar, sarod, tambura, sahnai, sarangi, and tabla; while instruments commonly used in Karnatak classical music include the vina, mrdangam, kanjira, and violin. The use of bamboo flutes, such as the murali, is common to both traditions as well as many other genres of Indian music. In fact, many of these instruments are often used in both North and South India, and there are many clear relationships between the instruments of both regions. Furthermore, often instruments that are slightly different in construction will be identified by the same name in both the south and the north, though they might be used differently.

Throughout its history, the peoples of India have developed numerous systems for classifying musical instruments, many of which were based on morphological characteristics. The ancient Hindu system divided instruments into four categories: stretched (strings; 2008.141.2a,b), covered (drums; 89.4.165), hollow (wind; 1986.12), and solid (bells; 89.4.154). This system is widely known to be the inspiration for the Western system of instrument classification put forth by Mahillon in 1880, which renames these groups—chordophones, membranophones, aerophones, and idiophones—basing the distinction on the way in which sound is created and not exclusively on construction.

VOCABULARY

A note on spelling: All terms used for Indian musical instruments and musical concepts are common transliterations of the original terms. Subsequently, there are numerous possible methods of rendering the same term in English and inevitable discrepancies in spelling. The spellings adopted here are the ones used by The New Grove Dictionary of Music and Musicians (2001).

Kanjira (Khanjari)
The kanjira is a frame drum of South India. It consists of a skin (usually iguana) stretched and pasted on a circular wooden frame. There are often three or four slots in the side of the frame, in which bell-metal jingle-disks are suspended from metal crossbars. The name kanjira is related to the khanjari and kanjani of North and East India and Nepal. The kanjira is tuned to various pitches by wetting the skin. It is held at the bottom of the frame by the left hand, which also varies the tension of the skin, and is beaten with the fingers of the right hand.

Kamanche
The kamanche is one of the world’s earliest known bowed instruments. It has been altered and changed as it has traveled to other parts of the world (1998.72). Some argue that the kamanche is the predecessor of many other stringed instruments such as the rabab, the sarangi, and the Chinese erhu.

Mrdangam
The mrdangam is an elongated barrel-shaped drum found predominantly in South India (1986.467.18). It is derived from the pakhavaj and is used as the primary rhythmic accompaniment in Karnatak music as well as in religious Kirtan music. In the east (Bengal, Odisha), this barrel-shaped drum is known as the khol.

Murali
The murali is a transverse flute made of bamboo. It is used in a variety of musical genres and is often associated with the Hindu deity Krishna.

Pakhavaj
The pakhavaj is a barrel-shaped drum with two heads, each of which contains tuning paste, or siyahi. The history of the pakhavaj is unknown, yet as the predecessor of both the Hindustani tabla drums and the mrdangam of Karnatak music, it served as the primary accompaniment for much of Indian classical music. It appears in the musical iconography of Hindu religious painting and in the artworks of the royal Muslim courts of the Mughal empire.

Rabab
The rabab is a stringed instrument with a skin-covered resonator that can be bowed or plucked depending on performance tradition. It is found in various forms throughout North Africa, the Near East, South Asia, and Central Asia. Similar to the way the setar and the vina were adapted to eventually become what is known today as the sitar, the rabab was adapted to become the sarod. However, there are many musicians in India today who still play the rabab, and it is quite popular in several music genres.

Sahnai (Shenai)
The sahnai is a double reed instrument of North India and Nepal. In South India, a double reed instrument called the nagasvaram is used. Both instruments have seven equidistant fingerholes and no thumbhole. Frequently, the instrument’s flared open end is made of metal while its body is made of wood or bamboo; however, they are not exclusively made in this fashion.

Sarangi
A sarangi is a bowed stringed instrument with a skin-covered resonator (89.4.200). The typical sarangi is made by hand, usually from a single block of tun wood about 66 to 69 centimeters long (46.34.43). The three playing strings are made of goat gut, and the sympathetic strings (usually as many as thirty-six, though the number varies) of brass and/or steel. However, the design of sarangis varies from region to region (1982.143.2). For example, the Nepalese sarangi is generally much smaller than its Indian counterpart, and not all sarangis have sympathetic strings.

Sarod
The sarod is a relatively new instrument to South Asia, having been around for less than 200 years. The sarod is a plucked stringed instrument with a skin-covered resonator and sympathetic strings. Like the sitar, it is primarily used in Hindustani music and is accompanied by the tabla.

Setar
The word setar means “three strings.” Other instruments in this family include the two-stringed dutar and the single-stringed ektar. As Indian musicians adopted the setar, they added more and more strings. Early sitars, which evolved from the setar, have six strings, while more contemporary ones include six playing strings and thirteen sympathetic strings. A Persian setar in the Museum’s collection is a miniature that was made primarily for the purpose of decoration. Many such instruments exist in India.

Sitar
The sitar is easily India’s most famous musical instrument overseas, having been popularized in the West by George Harrison of the Beatles, who studied with Ravi Shankar, one of the greatest sitarists of the twentieth century. The sitar has its roots in both the Persian setar as well as in the vina. Like many stringed instruments used in classical Indian music, the modern sitar (1999.399) has sympathetic strings that sound only when one of the primary strings is struck on the same note. These strings, which are never played by the performer, resound in sympathy with the playing strings, creating a polyphonic timber that many have come to associate with India through the popularity of this instrument. It is interesting to note, however, that the addition of the sympathetic strings is a relatively recent development in Indian music starting in the late nineteenth century (89.4.1586). The use of sympathetic strings is known to have existed in other parts of the world prior to their initial use in India.

Tabla
The tabla is actually two drums played by the same performer. Both drums have compound skins onto which a tuning paste, or siyahi, is added to help generate the wide variety of tones these drums can produce. The bayan is the larger of the two drums and is generally made of metal or pottery. The siyahi on the bayan is off-center, which allows the performer to add variable pressure on the skin, changing the pitch of the instrument with the palm of his or her hand while striking it with the fingertips. The smaller drum is called the dahini, or sometimes referred to as the tabla. Dahini are usually made of heavy lathe-turned rosewood and provide much higher pitch sounds than does the bayan.

Tambura
The tambura is a long, stringed instrument made of light hollow wood, with either a wooden or a gourd resonator. It is typically used in accompaniment with other instruments, providing a drone pitch. Some of the tamburas in the Museum’s collection are not full-sized instruments, but rather miniatures created for their aesthetic appearance. The artistic craftsmanship on the inlay in these objects is beautiful. India has a long history of creating musical instruments as decorative objects, and that tradition is represented in the Museum’s collection.

Vina
Along with the pakhavaj, the vina is one of the most commonly depicted instruments in Indian iconography. The vina has taken many forms in both South and North India. In North India, it was called the bin or the rudravina, and was the predecessor of the sitar. It was often built of two large gourd resonators connected by a piece of bamboo, with frets held on with wax. Most of the vinas depicted in iconography are rudravinas. In the South, the vina—or saraswati vina—continues to be the most popular stringed instrument in classical music. In its basic shape, the vina is a hollow wooden stringed instrument with two gourd resonators (though there can often be more than two or sometimes only one gourd resonator). The gottuvadyam, or chitravina, is another important instrument in Karnatak music. Unlike the rudravina and the saraswati vina, the gottuvadyam has no frets and is played with a slide using a method similar to that of the Hawaiian slide guitar.

Allen Roda
Independent Scholar

March 2009

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