Nana Sahib In Hindi Essay On My Mother

Tatya Tope

पूरा नाम – रामचंद्रराव पांडुरंगराव येवलकर
जन्म      – सन 1814
जन्मस्थान – यवला (महाराष्ट्र)
पिता      – पांडुरंग
माता      – रुकमाबाई

तात्या टोपे की जीवनी – Tatya Tope in Hindi

बिठूर में तात्या टोपे का लालन-पालन हुआ। बचपन में उन्हें नाना साहब से अत्यंत स्नेह था। इसलिए उन्होंने जीवन-पर्यन्त नाना की सेवा की। उनका प्रारंभिक जीवन उदित होते हुए सूर्य की तरह था।

क्रांती में योगदान की कहानी तांत्या के जीवन में कानपुर-विद्रोह के समय से प्रारंभ होती है। तांत्या काफी ओजस्वी और प्रभावशाली व्यक्ति थे। उनमे साहस, शौर्य, तत्परता, तत्क्षण निर्णय की क्षमता एवं स्फूर्ति आदी अनेक प्रमुख गुण थे।

क्रांति के दिनों में उन्होंने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई एवं नाना साहब का भरपूर साथ दिया। शिवराजपुर के सेनापति के रूप में उन्होंने फौजियों का नेतृत्व किया। कानपुर विजय का श्रेय भी उन्हीं को है।

तांत्या ने कालपी को अपने अधिकार में लेकर उसे क्रांतिकारियों का महत्वपूर्ण गढ़ बनाया। जहां एक ओर कई महत्वपूर्ण विजय प्राप्त की, वहीं दूसरी ओर उन्होंने कई बार अंग्रेज सेनापतियों को अपने गुरिल्ला ढंग के आक्रमणों के कारण सकते में डाला।

सारे देश में अंग्रेजी सेना उस समय तांत्या की तलाश कर रही थी और तांत्या क्रांतिकारियों को संगठित करने साथ अंग्रेजों पर छटपट आक्रमण करने में जुटे हुए थे। उस समय उनका नाम शौर्य और साहस का पर्याय बन गया था।

तांत्या ने काफी समय तक जंगलों में भटककर कई कष्ट भी झेले। सहसा 7 अप्रैल, 1859 को विश्वसघाती ने उन्हें अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिया। मुकदमे के दौरान तांत्या ने कहा कि मैंने जो कुछ किया है। वह अपने देश की स्वतंत्रता के लिए किया है। इसी वर्ष देश की पहली क्रांती का सूर्य अस्त हुआ.।

उसका अंत 18 अप्रैल, 1859 को हँसते-हँसते फाँसी के तख्ते पर चढ़ने के साथ समाप्त होता है। देश के प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम को चिरस्मरणीय बनाने का अत्यधिक श्रेय तांत्या टोपे को जाता है।

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Tatya Tope death: 18 अप्रैल, 1859

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Gyani Pandit

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नाना साहेब शिवाजी के शासनकाल के बाद के सबसे प्रभावशाली शासकों में से एक थे। उन्हें बालाजी बाजीराव के नाम से भी संबोधित किया गया था। 1749 में जब छत्रपति शाहू की मृत्यु हो गई, तब उन्होंने पेशवाओं को मराठा साम्राज्य का शासक बना दिया था। शाहू का अपना कोई वारिस नही था इसलिए उन्होंने बहादुर पेशवाओं को अपने राज्य का वारिस नियुक्त किया था।

नाना साहेब के दो भाई थे, क्रमशः रघुनाथराव और जनार्दन। रघुनाथराव ने अंग्रेज़ों से हाथ मिलकर मराठाओं को धोखा दिया, जबकि जनार्दन की अल्पायु में ही मृत्यु हो गयी थी। नाना साहेब ने 20 वर्ष तक मराठा साम्राज्य पर शासन किया (1740 से 1761)।

मराठा साम्राज्य के एक शासक होने के नाते, नाना साहेब ने पुणे शहर के विकास के लिए भारी योगदान दिया। उनके शासनकाल के दौरान, उन्होंने पूना को पूर्णतयः एक गांव से एक शहर में बदल दिया था। उन्होंने शहर में नए इलाकों, मंदिरों, और पुलों की स्थापना करके शहर को एक नया रूप दे दिया। उन्होंने कटराज शहर में एक जलाशय की स्थापना भी की थी। नाना साहेब एक बहुत ही महत्वाकांक्षी शासक और एक बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे।

1741 में,उनके चाचा चिमणजी का निधन हो गया जिसके फलस्वरूप उन्हें उत्तरी जिलों से लौटना पड़ा और उन्होंने पुणे के नागरिक प्रशासन में सुधार करने के लिए अगला एक साल बिताया। डेक्कन में, 1741 से 1745 तक की अवधि को अमन और शांति की अवधि माना जाता था। इस दौरान उन्होंने कृषि को प्रोत्साहित किया, ग्रामीणों को सुरक्षा दी और राज्य में काफी सुधार किया।

1761 में, पानीपत की तीसरी लड़ाई में अफगानिस्तान के एक महान योद्धा अहमदशाह अब्दाली के खिलाफ मराठाओं की हार हुयी। मराठों ने उत्तर में अपनी शक्ति और मुगल शासन बचाने की कोशिश की। लड़ाई में नानासाहेब के चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ (चिमाजी अप्पा के पुत्र), और उनके सबसे बड़े पुत्र विश्वासराव मारे गए थे। उनके बेटे और चचेरे भाई की अकाल मृत्यु उनके लिए एक गंभीर झटका थी। उसके बाद नाना साहेब भी ज़्यादा समय के लिए जीवित नहीं रहे। उनका दूसरा बेटा माधवराव पेशवा उनकी मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा।नाना साहेब के बारे में तथ्य और जानकारी

नाना साहेब के बारे में तथ्य और जानकारी

जन्म 19 मई 1824 (बिठूर)
तिरोहित (गायब हुए)1857 (कवनपुर)
राष्ट्रीयता भारतीय 
उपाधि पेशवा 
पूर्वजबाजीराव द्वितीय 
धर्म हिन्दू 
पिता नारायण भट्ट 
माता गंगा बाई 
दत्तक ग्रहणबाजीराव ने 1827 में नाना साहिब को गोद ले लिया था।  
करीबी साथी तात्या टोपे और अज़ीमुल्लाह खान 
कवनपुर की घेराबंदी 1857 में जब कवनपुर की घेराबंदी कर ली, तो घिरे हुए अंग्रेज़ों ने नाना साहेब के नेतृत्व वाली भारतीय सेना के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। 
सतीचौरा घाट नरसंहार 27 जून 1857, महिलाओं और बच्चों सहित करीब 300 ब्रिटिश को सतीचौरा घाट पर मौत के घाट उतार दिया था।
अंग्रेज़ों द्वारा कवनपुर पर पुनः कब्ज़ा जनरल हैवलॉक और उनकी सेना ने 16 जुलाई 1857 को अहिरवा गांव में साहिब की सेना पर हमला किया और कवनपुर पुनः प्राप्त कर लिया।
1859 में साहिब नेपाल कूच कर गए।  
कथाओं में वर्णन नाना साहिब का अंत , जूल्स वर्नी द्वारा 
द डेविल्स विंड , मनोहर मंगोलकर द्वारा 

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